धर्म के आईने में झांकता समाज

धर्म के आईने में झांकता समाज
"सुनीत द्विवेदी"
उत्तर प्रदेश के देहातों और उत्तराखंड की पहाड़ियों से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जहां कथित तौर पर चंगाई सभाओं, बीमारी के इलाज और मुफ्त शिक्षा के प्रलोभन के जरिए गरीबों और दलितों के मतांतरण के आरोप लगते हैं। प्रशासनिक आंकड़े और दर्ज मुकदमे इस बात की गवाही देते हैं कि यह विषय केवल सामाजिक विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि अब एक गंभीर कानूनी और प्रशासनिक चुनौती बन चुका है।
इस चुनौती से निपटने के लिए दोनों राज्यों ने अपने कानूनी ढांचे को कड़ा किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 लागू किया, जिसे बाद में संशोधनों के जरिए और सख्त बनाया गया। नए संशोधनों के तहत अवैध धर्मांतरण, खासकर महिलाओं, नाबालिगों और एससी/एसटी वर्ग के मामलों या विदेशी फंडिंग के जरिए कराए गए मतांतरण में 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। साथ ही, अब केवल पीड़ित ही नहीं, बल्कि कोई भी व्यक्ति इसकी शिकायत दर्ज करा सकता है। वहीं, उत्तराखंड में उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2018 और इसके 2022 के संशोधनों के तहत जबरन या प्रलोभन द्वारा धर्मांतरण को गैर-जमानती अपराध बनाया गया है, जिसमें 2 से 7 साल तक की कैद का नियम है। धर्मांतरण से पहले जिला मजिस्ट्रेट को एक माह पूर्व पूर्व-सूचना देना अनिवार्य किया गया है।
दोनों कानूनों में मुफ्त शिक्षा, उपहार, रोजगार या 'दैवीय कृपा' का वादा करने को अवैध प्रलोभन की श्रेणी में रखा गया है। फतेहपुर, आजमगढ़, रामपुर जैसे उत्तर प्रदेश के जिलों और उत्तराखंड के उधम सिंह नगर व देहरादून के ग्रामीण अंचलों में दर्ज प्राथमिकियों के अध्ययन से साफ होता है कि यह प्रभाव मुख्यतः उन बस्तियों में अधिक है, जो आर्थिक तंगी, अशिक्षा और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रही हैं। जब किसी गंभीर बीमारी के समय सरकारी अस्पताल दूर हों और निजी इलाज का खर्च संभव न हो, तब 'प्रार्थना से चमत्कार' और तात्कालिक राहत का वादा सबसे आसान रास्ता बन जाता है।
हालांकि पुलिसिया कार्रवाई और कड़े कानूनों से संदिग्ध गतिविधियों पर लगाम लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन न्यायपालिका के समक्ष कई मामलों में साक्ष्य के अभाव या कानूनी पेचीदगियों के कारण सजा की दर सीमित रही है। इतिहास और समाजशास्त्र इस बात के साक्षी हैं कि केवल धाराएं और जेल की सजा सामाजिक असंतुलन को पूरी तरह नहीं पाट सकतीं।
"जब तक समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े दलित और वंचित वर्ग को सम्मान, सामाजिक बराबरी और स्वास्थ्य-शिक्षा की गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक लाचारी का फायदा उठाने वाले रास्ते तलाशते रहेंगे। आस्था का संरक्षण केवल थानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज के आत्ममंथन का विषय है।"
(लेखक TV10 INDIA MEDIA NETWORK के संपादक हैं।)
