गोमुख और केदारताल में बन रही छोटी झीलों से बढ़ा आपदा का खतरा: नेपाल-तिब्बत त्रासदी के बाद पर्यावरणविदों की चिंता; अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की मांग

उत्तरकाशी: पड़ोसी देश नेपाल और तिब्बत में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदाओं के बाद अब उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बन रही झीलों को लेकर चिंता बढ़ गई है। गंगोत्री ग्लेशियर के गोमुख और केदारताल क्षेत्र में ग्लेशियर के मलबे पर बन रही छोटी-छोटी झीलों ने पर्यावरणविदों और गंगा संरक्षण से जुड़े लोगों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण 4 से 5 हजार मीटर की ऊंचाई पर अब बर्फबारी की जगह तेज बारिश हो रही है, जिससे इन झीलों में पानी का दबाव बढ़ रहा है और ये कभी भी बड़ी तबाही का रूप ले सकती हैं।
3 बड़ी बातें:
बारिश से बढ़ रहा जलस्तर: अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ की जगह बारिश होने से ग्लेशियर मलबे पर बनी झीलों में पानी का फैलाव बढ़ रहा है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम की मांग: पर्यावरणविदों ने सरकार से गोमुख और केदारताल क्षेत्र की सैटेलाइट निगरानी व पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) लगाने की मांग की।
वैज्ञानिकों का तर्क: वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान का कहना है कि ये झीलें सुपरा ग्लेशियर (अस्थाई) हैं, इसलिए इनसे तत्काल बड़े खतरे की आशंका नहीं है।
ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ की जगह बारिश, झीलों में बढ़ता पानी
पर्यावरणविद सुरेश भाई का कहना है कि गंगोत्री घाटी और ग्लेशियर क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। पहले समुद्र तल से 4000 से 5000 मीटर की ऊंचाई पर हल्की बूंदाबांदी होते ही बर्फबारी शुरू हो जाती थी, लेकिन अब इन ऊंचाइयों पर सीधे तेज बारिश हो रही है। इस बारिश के चलते गोमुख और केदारताल के ग्लेशियर मलबे (Moraine) पर बनी झीलों में पानी की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। यदि ये प्राकृतिक बांध टूटे, तो निचले क्षेत्रों में भारी तबाही मच सकती है।
'सरकार कराए गहन अध्ययन, तुरंत लगे अर्ली वार्निंग सिस्टम'
गंगा विचार मंच के प्रांत संयोजक लोकेंद्र बिष्ट और हाल ही में गोमुख क्षेत्र से लौटे ग्राम प्रहरी प्रखर बिष्ट ने सरकार से मांग की है कि इन झीलों का भू-वैज्ञानिकों से गहन तकनीकी अध्ययन कराया जाए। उन्होंने कहा कि समय रहते इन झीलों की सटीक मैपिंग और निगरानी के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाना बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी खतरे की स्थिति में निचले इलाकों को समय पर अलर्ट किया जा सके।
वैज्ञानिक बोले— 'ये सुपरा ग्लेशियर झीलें हैं, बड़ा खतरा नहीं'
दूसरी ओर, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता ने इस पर राहत भरा पहलू सामने रखा है। उनका कहना है कि गोमुख और उसके आसपास बनी झीलें 'सुपरा ग्लेशियर झीलें' (Supraglacial Lakes) हैं। ये झीलें ग्लेशियर की ऊपरी सतह पर बर्फ पिघलने से बनती हैं और इनमें से अधिकांश मौसमी व अस्थाई होती हैं। तापमान कम होने या पानी का प्राकृतिक निकास होने पर ये स्वतः समाप्त हो जाती हैं, इसलिए इनसे किसी बड़े जलप्रलय या खतरे की आशंका कम होती है।
जानिए क्या होती हैं सुपरा ग्लेशियर झीलें?
ग्लेशियर की सतह पर निर्माण: जब गर्मियों या बारिश के दिनों में ग्लेशियर की बर्फ पिघलती है, तो सतह के गड्ढों और मलबे के बीच पानी जमा होकर छोटी झीलों का रूप ले लेता है।
अस्थाई स्वरूप: ये झीलें आमतौर पर कुछ हफ्तों या महीनों के लिए ही बनती हैं और बर्फ के खिसकने या रास्ता मिलने पर इनका पानी धीरे-धीरे निकल जाता है।
