
सद्भावना और संवाद का खोता कैनवास
"सुनीत द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार"
जब भी हम राष्ट्रीय तिथियों के पन्नों को पलटते हैं, तो 20 अगस्त यानी 'सद्भावना दिवस' एक ऐसे पड़ाव की तरह सामने आता है, जो सिर्फ औपचारिकता तक सिमट कर रह गया है। आज के दौर में जब राजनीति और समाज के बीच संवाद की भाषा में तल्खी और कड़वाहट घुल चुकी है, तब इस शब्द की प्रासंगिकता और गहराई पर नए सिरे से विचार करने की अनिवार्य आवश्यकता महसूस होती है।
क्या विविधता से भरे इस महान देश में 'मतभेद' अब 'मनभेद' और खुली शत्रुता में तब्दील होते जा रहे हैं? हालिया सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को देखें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि हमने असहमति के लोकतांत्रिक स्पेस को पूरी तरह सिकोड़ लिया है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम और आभासी दुनिया की अंधी दौड़ ने समाज को ऐसे खांचों में बांट दिया है, जहां हर कोई अपने दायरे में सही है और दूसरा सिर्फ 'प्रतिद्वंद्वी' या 'दुश्मन' है।
क्या यही वह भारत है, जिसकी कल्पना हमारे स्वाधीनता सेनानियों और विचारकों ने की थी? यदि हम इतिहास के पन्नों को खंगालें, तो पाएंगे कि लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी जीवंत बहसों और तर्कों में निहित है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की स्मृति से जुड़े इस दिवस का मूल उद्देश्य ही यही था कि देश में राष्ट्रीय अखंडता, सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी भाईचारे को बढ़ावा दिया जाए। लेकिन विडंबना यह है कि आज सद्भावना जैसे शब्द केवल मंचों के भाषणों या सरकारी विज्ञप्तियों की शोभा बढ़ाने तक सीमित रह गए हैं।
"आज हमें यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हमने अपनी राजनीतिक संस्कृति में संयम और शालीनता की सीमाओं को लांघ दिया है। जब सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद की जगह बयानों के बाण लेने लगें, तो उसका सीधा असर आम जनजीवन और देश की युवा पीढ़ी पर पड़ता है।"
जब तक शीर्ष स्तर पर भाषा की मर्यादा और वैचारिक सहिष्णुता का परिचय नहीं दिया जाएगा, तब तक निचले पायदान पर बैठे समाज से सद्भावना की उम्मीद करना बेमानी है। हमें चीन या अन्य प्रगतिशील राष्ट्रों की तरह अपने यहाँ केवल भौतिक विकास पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक आचार-व्यवहार और सार्वजनिक अनुशासन पर भी नए सिरे से काम करना होगा।असहमति के बिंदुओं को दरकिनार किए बिना, उनके साथ जीना और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना ही असली लोकतंत्र है।सद्भावना दिवस महज एक तारीख नहीं, बल्कि एक गंभीर आत्मविश्लेषण का अवसर है। अगर हम वाकई एक आधुनिक, सशक्त और वैश्विक महाशक्ति बनने की राह पर आगे बढ़ रहे हैं, तो हमें दिलों के बीच खिंचती इन दूरियों की दीवारों को गिराना ही होगा। अन्यथा, आर्थिक तरक्की के आंकड़े चाहे जितने भी चमकदार हों, एक भीतर से खोखला और बंटा हुआ समाज कभी इतिहास में दीर्घकालिक पदचाप नहीं छोड़ सकता।
