Himalayan GLOF Alert: नेपाल आपदा के बाद भारत के हिमालयी राज्यों में अलर्ट, क्या हैं इसके वैज्ञानिक कारण?

विशेष रिपोर्ट: नेपाल के रसुवा और धाडिंग जिले में हैंगिंग ग्लेशियर टूटने और भीषण एवलांच से आई प्रलयंकारी बाढ़ ने एक बार फिर पूरे हिमालयी क्षेत्र को हिलाकर रख दिया है। चीन-नेपाल सीमा पर ल्हेंडे खोला और भोटेकोशी नदी में आए इस सैलाब ने न केवल नेपाल में भारी तबाही मचाई है, बल्कि भारत के लिए भी एक बड़ा 'रेड अलर्ट' जारी कर दिया है।
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG) और अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) की ताजा रिपोर्टों ने पुष्टि की है कि यह आपदा किसी भूकंप से नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के चलते कमजोर हुए हैंगिंग ग्लेशियर और विशालकाय आइस एवलांच (हिमस्खलन) के कारण आई है।
5 बड़ी बातें (Key Highlights):
भूकंप नहीं, 5.2 तीव्रता का था 'लैंडस्लाइड वाइब्रेशन': USGS ने खुलासा किया कि नेपाल सीमा पर 4.4 तीव्रता का भूकंप नहीं आया था, बल्कि यह चट्टान और बर्फ के विशाल हिस्से के गिरने से पैदा हुआ कंपन था, जिसकी ऊर्जा 5.2 तीव्रता के बराबर थी।
हैंगिंग ग्लेशियर से बनी 'अस्थायी झील': वाडिया संस्थान के अनुसार, लंगटांग के दूसरी तरफ स्थित हैंगिंग ग्लेशियर टूटकर नदी में गिरा, जिससे बना प्राकृतिक बांध (डैमिंग) अचानक टूट गया और फ्लैश फ्लड आ गया।
भारत में 432 ग्लेशियर झीलों का तेजी से विस्तार: केंद्रीय जल आयोग (CWC) के मुताबिक, भारत में 432 ग्लेशियल झीलें लगातार बड़ी हो रही हैं, जिनमें से 56 'बेहद उच्च जोखिम' (High Risk) श्रेणी में हैं।
उत्तराखंड में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों का साया: अलकनंदा बेसिन में 219 लटकते हुए ग्लेशियर चिन्हित हैं, जो बद्रीनाथ-माणा समेत निचले इलाकों के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं।
बिहार के 8 जिलों में हाई अलर्ट: नेपाल से पानी के भारी दबाव को देखते हुए पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकिनगर गंडक बैराज के सभी 36 फाटक खोल दिए गए हैं।
नेपाल में कैसे फूटा 'ग्लेशियर बम'? वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता के अनुसार:
"ग्लेशियर के आसपास अत्यधिक गतिविधियों के कारण आइस एवलांच आया। इस मलबे ने नदी के बहाव को रोककर एक अस्थायी प्राकृतिक डैम (डैमिंग) बना दिया। कुछ ही देर में जब पानी का दबाव बढ़ा, तो यह बांध टूट गया और फ्लैश फ्लड के रूप में निचले इलाकों में कहर बनकर टूटा। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और कमजोर मलबा (Loose Material) छोड़ रहे हैं, जिसमें पानी सोखने की क्षमता नहीं होती।"
संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत ने भी स्पष्ट किया कि इस तबाही के पीछे भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियर और लैंडस्लाइड का संयुक्त प्रभाव था।
वहीं, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रो. राकेश कुमार मैखुरी का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते हिमालय की बर्फ बेहद कमजोर हो चुकी है। संकरी घाटियों में जब लाखों टन बर्फ और चट्टानें एक साथ गिरती हैं, तो यह सीधे तौर पर 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) का रूप ले लेती हैं।
क्या होता है GLOF और हैंगिंग ग्लेशियर?
ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उनके साथ बहकर आई मिट्टी और पत्थरों (मोरेन) से एक कच्चा प्राकृतिक बांध बन जाता है, जिसके पीछे भारी मात्रा में पानी जमा होकर झील बन जाती है। जब भारी बारिश, हिमस्खलन या पहाड़ का टुकड़ा गिरने से यह कच्चा बांध अचानक टूटता है, तो लाखों क्यूसेक पानी मलबे के साथ नीचे की ओर बह निकलता है।
हैंगिंग ग्लेशियर (लटकते ग्लेशियर): ये वे ग्लेशियर होते हैं जो सीधी और खड़ी चट्टानों की ढलानों पर टिके रहते हैं। तापमान बढ़ने पर इनकी बर्फ की पकड़ ढीली हो जाती है और ये बिना किसी पूर्व चेतावनी के सीधे नीचे की घाटियों में गिर जाते हैं।
भारत पर कितना बड़ा खतरा? CWC की चौंकाने वाली रिपोर्ट
केंद्रीय जल आयोग (CWC) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में पिछले एक दशक में ग्लेशियल झीलों का क्षेत्रफल खतरनाक दर से बढ़ा है:
विवरण
आंकड़े
कुल मॉनिटर की जा रही झीलें
2,485 झीलें
हाई रिस्क (अत्यधिक संवेदनशील) झीलें
56 झीलें
तेजी से फैलती झीलें (CWC रिपोर्ट)
432 झीलें
2011 में झीलों का कुल क्षेत्रफल
1,917 हेक्टेयर
2025 में झीलों का कुल क्षेत्रफल
2,508 हेक्टेयर
राज्यों के अनुसार संवेदनशील झीलों की संख्या:
अरुणाचल प्रदेश: 197 झीलें
लद्दाख: 120 झीलें
जम्मू और कश्मीर: 57 झीलें
सिक्किम: 47 झीलें
हिमाचल प्रदेश: 06 झीलें
उत्तराखंड: 05 झीलें
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ झीलों के फटने का खतरा नहीं है, बल्कि इनके बहाव क्षेत्र में आने वाले हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, राष्ट्रीय राजमार्ग, पुल और लाखों की आबादी भी सीधे निशाने पर हैं।
15 साल में 5 महाप्रलय: जब हिमालय के ग्लेशियरों ने मचाया तांडव
2013 (केदारनाथ आपदा, उत्तराखंड): चोराबाड़ी ग्लेशियल झील फटने और भारी बारिश से मंदाकिनी नदी में आई बाढ़ ने 6,000 से अधिक लोगों की जान ले ली थी।
2021 (चमोली आपदा, उत्तराखंड): 7 फरवरी को बर्फ और चट्टान का विशाल हिस्सा टूटने से ऋषिगंगा और धौलीगंगा में सैलाब आया; 200 से अधिक लोगों की मौत हुई और ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट पूरी तरह तबाह हो गया।
2021 (मेलमची बाढ़, नेपाल): लगातार बारिश और पेमधुम त्सो झील में उफान से मेलमची बाजार 10 मीटर मलबे में दब गया था।
2023 (साउथ ल्होनक झील, सिक्किम): साउथ ल्होनक झील का मोरेन टूटने से तीस्ता नदी में सुनामी जैसी लहरें उठीं, जिसमें 70 से अधिक लोगों की जान गई और NH-10 सहित 13 पुल बह गए।
2026 (रसुवा-धाडिंग आपदा, नेपाल): हैंगिंग ग्लेशियर और एवलांच के बाद भोटेकोशी नदी घाटी में तबाही।
बिहार में अलर्ट: गंडक बैराज के 36 फाटक खोले गए
नेपाल से निकलने वाली नदियां भारत के डाउनस्ट्रीम इलाकों को सीधे प्रभावित करती हैं। भोटेकोशी नदी आगे चलकर सुनकोशी और फिर सप्तकोशी में मिलती है, जो बिहार में 'शोक की नदी' कही जाने वाली कोसी बनती है।
हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार नदी ने इस बार अपना रास्ता नहीं बदला है, जिससे तटबंध टूटने का तत्काल खतरा नहीं है, लेकिन एहतियातन पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकिनगर गंडक बैराज के सभी 36 फाटक खोल दिए गए हैं।
बिहार के इन 8 जिलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है:
पश्चिमी चंपारण (बगहा)
पूर्वी चंपारण (मोतिहारी)
गोपालगंज
सारण
मुजफ्फरपुर
वैशाली
सीतामढ़ी
शिवहर
क्या इस तबाही को रोका जा सकता है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियरों के टूटने को प्राकृतिक तौर पर पूरी तरह रोकना असंभव है, लेकिन इसके नुकसान को न्यूनतम जरूर किया जा सकता है:
ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण: जीवाश्म ईंधनों की खपत घटाना और कार्बन उत्सर्जन कम करना ही सबसे बड़ा दीर्घकालिक उपाय है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, वॉटर लेवल सेंसर और सैटेलाइट मॉनिटरिंग सिस्टम लगाना, ताकि पानी बढ़ने से पहले ही निचले इलाकों को खाली कराया जा सके।
नियंत्रित जल निकासी: सिक्किम और नेपाल की कुछ झीलों की तरह साइफन तकनीक या कृत्रिम चैनल बनाकर खतरनाक झीलों से पानी का स्तर कम करना।
