उत्तराखंड में होम स्टे योजना से बदल रही पहाड़ की तस्वीर, चार साल में 537 लोगों को मिला 79 करोड़ का अनुदान

देहरादून। उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों में पर्यटन को रोजगार से जोड़ने की कोशिश अब आंकड़ों में दिखने लगी है। दीनदयाल उपाध्याय होम स्टे विकास योजना के तहत बीते चार वर्षों में राज्य के 537 लोगों को होम स्टे शुरू करने के लिए अनुदान दिया जा चुका है। इस अवधि में लाभार्थियों तक कुल 79 करोड़ 28 लाख 18 हजार रुपये की धनराशि पहुंचाई गई है।
योजना का ढांचा पहाड़ और मैदान के लिए अलग-अलग रखा गया है। पर्वतीय क्षेत्रों में आवेदक को परियोजना लागत का 50 प्रतिशत अनुदान मिलता है, जिसकी अधिकतम सीमा 15 लाख रुपये है। मैदानी क्षेत्रों में यह अनुदान परियोजना लागत का 25 प्रतिशत और अधिकतम साढ़े सात लाख रुपये तय किया गया है। नगर निगम और नगर पालिका क्षेत्रों को योजना के दायरे से बाहर रखा गया है, ताकि लाभ वास्तव में ग्रामीण और कस्बाई इलाकों तक पहुंचे।
ट्रेकिंग रास्तों पर भी मिला सहारा
मेरी योजना मेरी सरकार के अंतर्गत संचालित ट्रेकिंग ट्रैक्शन सेंटर होम स्टे अनुदान योजना से चार वर्षों में 258 पात्र लोगों को लाभ मिला है। यह योजना खास तौर पर उन रास्तों पर केंद्रित है जहां ट्रेकिंग के लिए आने वाले सैलानियों की आवाजाही तो रहती है, लेकिन ठहरने का ढांचा अब तक सीमित था।
सीमांत गांवों के लिए वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम अलग से काम कर रहा है। इसके दायरे में उत्तरकाशी जिले के जादूंग और नेलांग जैसे गांव आते हैं। जादूंग में छह होम स्टे का निर्माण अंतिम चरण में है। रुद्रप्रयाग जिले का सारी गांव इस बदलाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण है, जहां अब चालीस से अधिक होम स्टे संचालित हो रहे हैं।
लौटते प्रवासियों को मिला काम
राज्य में करीब साढ़े छह हजार प्रवासी अपने गांव लौटे हैं और इनमें से बाईस प्रतिशत से अधिक ने होम स्टे संचालन को आजीविका के रूप में अपनाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मॉडल को पलायन रोकने की दिशा में ठोस कदम बताया है।
अनुदान पाने के लिए तय शर्तें इस प्रकार हैं:
- आवेदक का उत्तराखंड का मूल निवासी होना अनिवार्य है
- पर्यटन विकास परिषद में होम स्टे का पंजीकरण जरूरी है
- जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति साक्षात्कार के बाद चयन करती है
- चयन के बाद ही बैंक ऋण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है
पर्यटन विभाग का आकलन है कि होम स्टे मॉडल से गांवों में स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक भोजन और लोक संस्कृति को भी नया बाजार मिल रहा है। जिन गांवों में यह मॉडल जम गया है, वहां युवाओं के लिए गाइड, वाहन संचालन और स्थानीय व्यंजन जैसे सहायक काम भी खुले हैं।
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