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देवभूमि का सियासी भूगोल: मौन पहाड़ और शोर भरी सियासत

20 September 2026

AI News Reader

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देवभूमि का सियासी भूगोल: मौन पहाड़ और शोर भरी सियासत
"सुनीत द्विवेदी"

हिमालय की घाटियों में जब कुहासा गहराता है, तो रास्ते भले ओझल दिखें, लेकिन पगडंडियां अपनी जगह कायम रहती हैं। उत्तराखंड की सियासत भी कुछ ऐसी ही पहेली है। बाहर से देखने पर यहां सब कुछ शांत, सुरम्य और एक ढर्रे पर चलता नजर आता है, लेकिन सतह के नीचे मथती राजनीतिक धाराओं को समझना हो, तो आपको राजधानी देहरादून के सियासी गलियारों से निकलकर पिथौरागढ़, पौड़ी और चमोली के उन वीरान होते गांवों की चौपालों तक जाना होगा, जहां हर शाम धुंधलके में सिर्फ उम्मीदें जलती हैं।
राज्य की राजनीति आज दो विपरीत छोरों पर खड़ी है। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी का वह अजेय प्रतीत होने वाला चुनावी ढांचा है, जिसे राष्ट्रवाद, मजबूत सांगठनिक तंत्र और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पर्वत सी छवि का सहारा है। पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और सख्त नकल विरोधी कानून जैसे फैसलों को अपनी ढाल बनाया है। पार्टी का पूरा विमर्श ‘देवभूमि की अस्मिता’ और सामरिक सुरक्षा के इर्द-गिर्द बुना गया है, जो फौजी परिवारों और धार्मिक मिजाज वाले मतदाताओं के दिल को सीधे छूता है।
लेकिन इसी सिक्के का दूसरा पहलू भी है। पहाड़ की ढलानों पर सत्ता विरोधी लहर का पत्थर धीरे-धीरे लुढ़कता है। रोजगार के सीमित साधन, पेपर लीक की गूंज, पहाड़ों से अनवरत पलायन और अंकिता भंडारी प्रकरण जैसी टीस आज भी नौजवानों और मातृशक्ति के सीने में सुलग रही है। भाजपा का संकट यह है कि उसकी जमीन दिल्ली के करिश्मे पर जितनी चमकती है, स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों के प्रति आमजन की बेरुखी उतनी ही गहरी होती जा रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस है। वह पार्टी जिसके पास उत्तराखंड के कोने-कोने में आज भी निष्ठावान काडर और पुरानी जड़ें मौजूद हैं। लेकिन त्रासदी यह है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी जंग विपक्ष से कम और खुद से ज्यादा है। गुटबाजी की पुरानी बीमारी ने पार्टी को भीतर से खोखला कर रखा है। हरीश रावत का सियासी तजुर्बा, यशपाल आर्य का दलित जनाधार और प्रीतम सिंह का अपना रसूख, सब अलग-अलग दिशाओं में बहती धाराएं हैं, जो मिलकर कभी अलकनंदा-भागीरथी जैसी ताकत नहीं बन पातीं। कांग्रेस के पास जनता के आक्रोश को गोलबंद करने का मौका तो है, लेकिन उस आक्रोश को वोट में तब्दील करने वाला कोई सर्वमान्य, आक्रामक और एकजुट चेहरा नदारद है।

"उत्तराखंड का मतदाता स्वभाव से आक्रामक नहीं, बल्कि बेहद संयमी और विचारवान होता है। वह तराई की धूप और पहाड़ की ठंड दोनों के मिजाज को बखूबी पहचानता है। भाजपा को यह गुमान नहीं पालना चाहिए कि चुनावी इतिहास बदलने के बाद पहाड़ हमेशा उसकी मुट्ठी में रहेगा और कांग्रेस को यह मुगालता छोड़ना होगा कि महज सत्ता विरोधी हवा उसे अपने आप सचिवालय तक पहुंचा देगी।"

पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी कब अपनी दिशा बदल ले, इसका पूर्वानुमान लगाना मौसम विभाग के लिए भी कठिन होता है और राजनीतिक पंडितों के लिए भी। फैसला इसी बात पर होगा कि कौन इन बेजुबान चोटियों के असल दर्द को जुबान दे पाता है।

भाजपा और कांग्रेस के अगले दांव
उत्तराखंड के राजनीतिक अखाड़े में दोनों मुख्य दल अब 2027 के विधानसभा चुनावों और उससे पहले की जमीन साधने के लिए अलग-अलग चुनावी ब्लूप्रिंट पर काम कर रहे हैं। पहाड़ की भौगोलिक और सामाजिक तासीर को देखते हुए दोनों दलों की रणनीतियां पूरी तरह बदल चुकी हैं।
भाजपा : ‘राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और सुशासन’ का फॉर्मूलाभाजपा पूरी तरह से अपने उस कोर फॉर्मूले पर टिकी है, जो उसे राष्ट्रीय स्तर पर बढ़त दिलाता है, लेकिन इसे स्थानीय और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के साथ जोड़ा जा रहा है।
सांगठनिक कसावट और माइक्रो-मैनेजमेंट: पार्टी पन्ना प्रमुखों और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने के लिए निरंतर अभियानों पर जोर दे रही है ताकि स्थानीय नाराजगी को नीचे ही दबाया जा सके।
बड़े और कड़े नीतिगत फैसले: समान नागरिक संहिता के बाद अब पार्टी जनता के बीच अपनी पहचान 'निर्णायक नेतृत्व' वाली पार्टी के रूप में स्थापित करना चाहती है। कड़े नकल-विरोधी कानून और धर्मांतरण कानून को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताकर वह युवाओं और महिलाओं को साधने में जुटी है।
फौजी और धार्मिक राष्ट्रवाद: उत्तराखंड के हर घर से कोई न कोई सेना में है, इसलिए सैन्य सम्मान, चारधाम महायोजना और सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को मुख्यधारा में रखना भाजपा का सबसे बड़ा राजनीतिक अस्त्र है।


कांग्रेस : ‘संजीवनी और आक्रोश एकीकरण’ का फॉर्मूलाभीतरी गुटबाजी से जूझ रही कांग्रेस के सामने अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए अब सुधारवादी और आक्रामक फॉर्मूले अपनाने की मजबूरी है।
सामूहिक नेतृत्व और समन्वय का प्रयास: पार्टी आलाकमान अब यह समझ चुका है कि किसी एक चेहरे पर दांव लगाने के बजाय सभी क्षत्रपों (हरीश रावत, प्रीतम सिंह, यशपाल आर्य, गणेश गोदियाल) को मिलाकर चलना होगा। बैठकों में गुटबाजी को दरकिनार कर साझा रणनीति बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
स्थानीय मुद्दों की गोलबंदी : कांग्रेस का पूरा फोकस पलायन, बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई और कानून-व्यवस्था के मुद्दों को सीधे गांवों तक ले जाने पर है। स्थानीय स्तर पर हो रहे आंदोलनों और बेरोजगार युवाओं के आक्रोश को हवा देना उनकी रणनीति का मुख्य हिस्सा है।
दलित और आदिवासी वोटों पर पकड़: राज्य के तराई क्षेत्रों और पहाड़ी जिलों में दलित और पिछड़ा वर्ग के वोटबैंक को एकजुट करने के लिए कांग्रेस नए सिरे से सामाजिक समीकरण साधने के फॉर्मूले पर काम कर रही है।
कुल मिलाकर, भाजपा का जोर ‘विकास, नीति और निरंतरता’ पर है, जबकि कांग्रेस का पूरा दारोमदार जनता की ‘सत्ता विरोधी भावना और स्थानीय असंतोष’ को भुनाने पर टिका है। असली मुकाबला इस बात का होगा कि भाजपा अपनी जमीनी कमियों को कितना छिपा पाती है और कांग्रेस अपनी अंदरूनी कलह को कितनी जल्दी सुलझाती है?

कुछ दिलचस्प सियासी मिथक, संयोग और जमीनी हकीकतें भी समझिए

सिटिंग मुख्यमंत्री की सीट का ‘मिथक’: उत्तराखंड की सियासत का सबसे अजीब और चर्चित अंधविश्वास या कहें इत्तेफाक यह रहा है कि चुनाव के वक्त जो भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा होता है, वह अपनी खुद की सीट हार जाता है। 2012 में बीसी खंडूड़ी कोटद्वार से हारे, 2017 में हरीश रावत दो-दो सीटों (हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा) से चुनाव हार गए, और 2022 में खुद पुष्कर सिंह धामी खटीमा से अपनी सीट नहीं बचा पाए थे (हालांकि बाद में चंपावत उपचुनाव में रिकॉर्ड वोटों से जीते)।
हरिद्वार और तराई का 'सत्ता की चाबी' होना: भले ही इसे 'पहाड़ी राज्य' कहा जाता हो, लेकिन विधानसभा की 70 में से लगभग 36 सीटें मैदानी और तराई इलाकों (देहरादून, हरिद्वार, उधम सिंह नगर और नैनीताल का मैदानी हिस्सा) में आती हैं। हरिद्वार जिले की 11 और उधम सिंह नगर की 9 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम, दलित, सिख और बंगाली वोटर समीकरण तय करते हैं। जो दल इन मैदानों में बाजी मारता है, देहरादून की सत्ता उसी की होती है।
एक ही घर में दो झंडे (परिवार की बंटी वफादारी): पहाड़ के छोटे सियासी हलकों में यह नजारा बहुत आम है कि एक ही परिवार का एक भाई भाजपा का जिलाध्यक्ष होता है और दूसरा भाई कांग्रेस का प्रदेश पदाधिकारी। चुनाव में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ तीखा प्रचार करते हैं और शाम को एक ही रसोई में चाय पीते हैं। यहां दल बदलते हैं, लेकिन खानदानी रसूख नहीं बदलता।
पलायन का सियासी विरोधाभास: उत्तराखंड में चुनावी भाषणों का सबसे बड़ा मुद्दा 'पहाड़ों से पलायन' होता है, लेकिन चुनावी गणित का सच यह है कि खाली होते गांवों की वजह से पहाड़ी जिलों में वोटिंग प्रतिशत लगातार गिर रहा है, जबकि मैदानी इलाकों में वोट बैंक तेजी से बढ़ रहा है। नेता भाषण पहाड़ के लिए देते हैं, लेकिन चुनावी समीकरण देहरादून और तराई की बस्तियों में बिठाते हैं।
हर पांच साल में तख्तापलट का 20 साल पुराना रिवाज: राज्य गठन (2000) के बाद से 2022 तक उत्तराखंड का यह अटूट नियम था कि जनता कभी किसी पार्टी को दोबारा सत्ता नहीं देती थी। एक बार भाजपा, एक बार कांग्रेस। 2022 में भाजपा ने पहली बार लगातार दूसरी जीत हासिल कर इस दो दशक पुराने सिलसिले को तोड़कर नया इतिहास रचा था।

(लेखक TV10 INDIA के संपादक हैं।)