सियासत के चौपड़ पर ‘तिरुक्कुरल’ का मर्म

"सुनीत द्विवेदी "
दिल्ली का भारत मंडपम इस समय सिर्फ एक भव्य इमारत नहीं, बल्कि दुनिया की बदलती धुरी का गवाह बन रहा है। एक तरफ यूक्रेन युद्ध के बाद से लगातार पश्चिमी पाबंदियों और कूटनीतिक चक्रव्यूह को झेलते रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हैं, तो दूसरी तरफ भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। दोनों आमने-सामने बैठे, गर्मजोशी से हाथ मिलाया और जब कैमरों की चमक के बीच दोनों नेताओं ने रक्षा, व्यापार और भविष्य की रणनीतियों के पन्नों को पलटा, तो दुनिया भर के थिंक टैंक अपनी-अपनी डायरियां लेकर हिसाब लगाने बैठ गए।लेकिन इस पूरी औपचारिक कूटनीति के बीच एक ऐसा लम्हा आया, जिसने इस मुलाकात के सियासी मायने को बहुत गहरा और दूरगामी बना दिया। नरेंद्र मोदी ने व्लादिमीर पुतिन के हाथों में महाकवि तिरुवल्लुवर रचित अमर ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ की एक प्रति थमाई। राजनयिक हलकों में कानाफूसी शुरू हो गई कि आखिर इस उपहार का निहितार्थ क्या है? क्या यह महज एक शिष्टाचार था? कतई नहीं। भारतीय राजनीति और कूटनीति के मिजाज को समझने वाले जानते हैं कि जब दिल्ली कुछ कहती है, तो उसके पीछे सदियों की सांस्कृतिक समझदारी और सधी हुई रणनीति होती है।‘तिरुक्कुरल’ केवल तमिल साहित्य का अनमोल रत्न नहीं है; यह धर्म, अर्थ और नीति का ऐसा दस्तावेज है जो शासक को उसकी मर्यादा और राजधर्म की याद दिलाता है।
"तिरुवल्लुवर ने लिखा था कि वही राजा यशस्वी होता है ,जो संकट के समय अपने मित्रों को पहचानता है, प्रजा के हित को सर्वोपरि रखता है और शक्ति के अहंकार से मुक्त होकर संयम के साथ शासन करता है। "
जरा सोचिए, आज की अशांत दुनिया में इससे मौजूं पैगाम और क्या हो सकता है? पुतिन को ‘तिरुक्कुरल’ देकर भारत ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। पहला संदेश मॉस्को के लिए है। भारत ने यह साफ कर दिया कि रूस हमारा पुराना, परखा हुआ और भरोसेमंद साथी है। पश्चिम के तमाम दबावों और धमकियों के बावजूद भारत ने कभी अपनी स्वायत्त विदेश नीति से समझौता नहीं किया। हमने उनसे कच्चा तेल भी लिया, एस-400 की डिलीवरी पर भी बात की और अपने रक्षा हितों को कभी दांव पर नहीं लगाया। लेकिन इसी के साथ भारत ने बिना शोर मचाए यह भी याद दिलाया कि संप्रभुता और शांति का संतुलन ही किसी भी राष्ट्रनायक की सबसे बड़ी पूंजी होती है।दूसरा संदेश वाशिंगटन और पश्चिमी राजधानियों के लिए है। जो देश भारत को किसी एक पाले में खड़ा देखना चाहते हैं, उन्हें दिल्ली की चौखट से यह सीधा संदेश मिल गया कि भारत किसी का पिछलग्गू नहीं बन सकता। हमारी नीति ‘गुटनिरपेक्षता’ से आगे बढ़कर ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के उस मुकाम पर पहुंच चुकी है, जहां हम अपने राष्ट्रीय हितों को अपनी शर्तों पर तय करते हैं।
हम अमेरिका से तकनीक और रणनीतिक साझेदारी करेंगे, तो रूस से दशकों पुरानी दोस्ती को भी नहीं भुलाएंगे।और तीसरा संदेश देश के भीतर का है। दक्षिण भारत की महान दार्शनिक विरासत को वैश्विक पटल पर सबसे बड़े मंच से स्थापित करना। जब दिल्ली का तख्त मास्को के जार को तमिल का यह कालजयी ग्रंथ सौंपता है, तो यह केवल दो देशों का संवाद नहीं रहता, यह भारत के सांस्कृतिक भूगोल के उस विराट स्वरूप का प्रकटीकरण बन जाता है, जहां उत्तर और दक्षिण की सीमाएं एकाकार हो जाती हैं।
"भारत मंडपम के बंद कमरों में जब रक्षा साजो-सामान के कलपुर्जों, रुपे-मीर कार्ड के गठजोड़ और यूरेशियन कॉरिडोर पर दस्तखत हो रहे थे, तब बाहर खड़े विश्लेषक बार-बार ‘तिरुक्कुरल’ के उस अध्याय को तलाश रहे थे जिसमें मित्र और शत्रु के स्वभाव का विवेचन है।"
दुनिया आज एक अजीब से दोराहे पर खड़ी है। बारूद की गंध हवाओं में तैर रही है, अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खा रही हैं और शक्ति संतुलन रोज नए करवट ले रहा है। ऐसे दौर में दो महाशक्तियों के नेताओं का बैठना और एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालकर बात करना केवल औपचारिकता नहीं हो सकता।मोदी और पुतिन की यह बैठक सिर्फ तेल और तोपों का सौदा नहीं है। यह इस बात का ऐलान है कि दुनिया चाहे जितने खेमों में बंट जाए, भारत अपनी शर्तों, अपनी संस्कृति और अपने स्वाभिमान के साथ दुनिया को रास्ता दिखाने की कुव्वत रखता है।
तिरुवल्लुवर के शब्दों में कहें तो—"सच्ची मित्रता चेहरे की मुस्कान नहीं, बल्कि वह सहारा है जो विपत्ति के समय बिना मांगे मिल जाता है।" दिल्ली ने मास्को को यही सहारा भी दिखाया है और राजधर्म का आईना भी।
(लेखक TV10 INDIA के संपादक हैं।)
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