हाथी की चाल और उत्तराधिकार का चक्रव्यूह

"सुनीत द्विवेदी "
उत्तर प्रदेश की राजनीति को अगर आप सिर्फ विधानसभा की सीटों और मत-प्रतिशतों के तराजू पर तौलने की कोशिश करेंगे, तो यकीनन धोखा खा जाएंगे। लखनऊ के मॉल एवेन्यू की खामोशी में जब भी कोई पत्ता खड़कता है, तो उसकी गूंज दिल्ली के लुटियंस जोन तक सुनाई देती है। इन दिनों बहुजन समाज पार्टी के भीतर चल रही उठापटक और आकाश आनंद को लेकर बदलते समीकरणों ने यूपी के सियासी गलियारों में एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर दी है। विरोधी दल चुटकियां ले रहे हैं, समर्थक पसोपेश में हैं और सियासी पंडित अपनी-अपनी पोथियां बांचे बैठे हैं।लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक बुआ और भतीजे के बीच की तनातनी है, या फिर यह उस राजनीतिक आंदोलन के अस्तित्व की लड़ाई है जिसे कांशीराम ने अपने पसीने से सींचा था?
"मायावती की राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि ‘बहनजी’ कभी भी फैसले दबाव में नहीं लेतीं। उनकी कार्यशैली हमेशा चौंकाने वाली रही है। जब उन्होंने आकाश आनंद को मंचों पर आगे बढ़ाया, उनके तेवर और जुबान में आक्रामकता दिखी, तो लगा कि बीएसपी अब सोशल मीडिया और नई पीढ़ी के मिजाज के मुताबिक खुद को ढाल रही है। लेकिन राजनीति का खेल इतना सीधा नहीं होता। "
जैसे ही लगा कि उत्तराधिकारी ने अपनी जमीन मजबूत कर ली है, अचानक फैसले बदले, जिम्मेदारियां छिनीं और फिर एक नया सियासी मोड़ सामने आ गया। मायावती के इस अंदाज को कोई 'अनुशासन' कहता है तो कोई 'असुरक्षा'। मगर हकीकत के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि बहुजन समाज पार्टी कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक व्यक्ति-केंद्रित कैडर आधारित ढांचा रहा है। यहां संगठन का पहिया सिर्फ और सिर्फ एक ही धुरी पर घूमता है। जब भी उस धुरी के समानांतर कोई दूसरा केंद्र बनने की कोशिश करता है, तो पार्टी का पूरा तंत्र उसे खारिज करने में देर नहीं लगाता।विरोधी दलों की बांछें खिली हुई हैं।
"समाजवादी पार्टी इसे 'दलित राजनीति का बिखराव' बताकर उस वोट बैंक में सेंध लगाने की फिराक में है, जिसे कभी बीएसपी का अभेद्य किला माना जाता था। उधर, भारतीय जनता पार्टी बेहद सतर्क निगाहों से इस तमाशे को देख रही है, क्योंकि गैर-जाटव दलित मतों का एक बड़ा हिस्सा पहले ही उसके पाले में जा चुका है और वह इस समीकरण में कोई नई दरार नहीं चाहती। वहीं चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा चेहरे खुद को कांशीराम के असली वारिस के तौर पर पेश करने की होड़ में हैं।"
लेकिन इस पूरी रस्साकशी में सबसे बड़ा नुकसान किसका हो रहा है?नुकसान उस आम दलित कार्यकर्ता का हो रहा है, जिसने साइकिल के कैरियर पर झंडा बांधकर, धूप-धूल फांकते हुए इस आंदोलन को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया था। आज वह कार्यकर्ता चौराहे पर खड़ा होकर पूछ रहा है कि आखिर पार्टी का मुस्तकबिल क्या है? जब फैसले रात के सन्नाटे में बंद कमरों से जारी होते हैं और सुबह तक समीकरण बदल जाते हैं, तो नीचे जमीन पर काम करने वाले का हौसला पस्त होना लाजिमी है।
आकाश आनंद अगर सचमुच नई पीढ़ी के नेता बनना चाहते हैं, तो उन्हें यह समझना होगा कि उत्तराधिकार सिर्फ खून के रिश्तों या घोषणाओं से हासिल नहीं होता। राजनीति में विरासत कमाई जाती है, लाठी खाकर, धूप में तपकर और कार्यकर्ताओं के साथ जमीन पर बैठकर। केवल बंद गाड़ियों और सुरक्षा के घेरे में रहकर आप उस जनता का भरोसा नहीं जीत सकते जो आज भी अपने स्वाभिमान के लिए संघर्ष कर रही है।वहीं, मायावती के सामने भी इतिहास का सबसे बड़ा इम्तिहान है। समय किसी के लिए नहीं ठहरता। अगर उन्होंने वक्त की नजाकत को नहीं समझा और नई पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपने में संकोच किया, तो आने वाले वक्त में इतिहास यह दर्ज करेगा कि जिस आंदोलन ने उत्तर भारत की सामाजिक संरचना को हिलाकर रख दिया था, वह अपने ही बनाए चक्रव्यूह में उलझकर बिखर गया।
लखनऊ की हवा में इस वक्त कई सवाल तैर रहे हैं। हाथी की चाल सुस्त जरूर दिख रही है, लेकिन सियासत के इस जंगल में कब कौन सा मोड़ आ जाए, कोई नहीं जानता। बस इतना तय है कि अगर नीले झंडे की साख को बचाना है, तो फैसले बंद कमरों के अहंकार से नहीं, बल्कि जमीन की पुकार सुनकर करने होंगे।
(लेखक TV10 INDIA के संपादक हैं।)
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