सौरमंडल ने शुरुआत में ही चुन लिया था अपना कच्चा माल, पहले दस लाख साल के पिंडों में 83 से 92 प्रतिशत कोंड्रयूल

न्यू हेवन। सौरमंडल ने अपने बनने के पहले दस लाख वर्षों के भीतर ही यह तय कर लिया था कि ग्रह किस कच्चे माल से बनेंगे। येल विश्वविद्यालय के नेतृत्व में हुए एक नए अध्ययन में पहली बार इसका रासायनिक प्रमाण मिला है। अध्ययन के अनुसार उस दौर के पिंडों में गर्मी से बने पत्थर के दाने यानी कोंड्रयूल की मात्रा 83 से 92 प्रतिशत तक थी।
इसका अर्थ यह हुआ कि बर्फ और धूल से बने ठंडे पदार्थ, जिसे मैट्रिक्स कहा जाता है, की हिस्सेदारी केवल 8 से 17 प्रतिशत रही। यह अनुपात आज ज्ञात किसी भी उल्कापिंड श्रेणी से कम है।
अध्ययन के पहले लेखक येल विश्वविद्यालय में पृथ्वी एवं ग्रह विज्ञान के सहायक प्रोफेसर डेमनवीर ग्रेवाल हैं। उनके साथ प्रिंसटन के झोंगटियन झांग और जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर सोलर सिस्टम रिसर्च की जोआना द्राज़कोव्स्का भी शामिल रहीं। नतीजे 'नेचर एस्ट्रोनॉमी' में प्रकाशित हुए हैं।
दो रासायनिक सुरागों से मिला जवाब
सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि पहले दस लाख वर्ष में बने ऐसे पिंड आज बचे ही नहीं हैं जो पिघले बिना रह गए हों। इसलिए शोधकर्ताओं ने दो अप्रत्यक्ष रासायनिक संकेतकों का सहारा लिया, जो मैट्रिक्स से जुड़े होते हैं —
- सल्फर, जो मुख्य रूप से मैट्रिक्स में केंद्रित रहता है
- लोहे की ऑक्सीकरण अवस्था, जो बर्फ और ऑक्सीकृत धूल की मौजूदगी बताती है
ग्रेवाल के अनुसार दोनों संकेतक अलग-अलग होकर भी एक ही कहानी कहते हैं — ये शुरुआती पिंड उल्लेखनीय रूप से मैट्रिक्स-रहित थे। उनका कहना है कि दोनों नतीजों का एक ही जगह मिलना ही इस निष्कर्ष को मजबूत बनाता है।
शुरुआत से ही चयनात्मक थी प्रक्रिया
ग्रेवाल का कहना है कि यह अध्ययन दिखाता है कि पिंडों के जुड़ने की यह प्रक्रिया शुरुआत से ही बेहद चयनात्मक थी। कोंड्रयूल मिलीमीटर आकार के पत्थर के दाने होते हैं, जो अत्यधिक गर्मी में बनते हैं और उल्कापिंडों में पाए जाते हैं। इन्हें ही वे बुनियादी इकाइयां माना जाता है जिनसे आगे चलकर ग्रह बने।
इससे पहले के अध्ययन केवल उन पिंडों में यह छंटाई पकड़ पाते थे जो सौरमंडल बनने के 20 से 40 लाख वर्ष बाद जुड़े थे। नया अध्ययन इस समय-सीमा को पीछे खिसकाकर पहले दस लाख वर्ष तक ले आया है।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह नतीजा एक पुरानी पहेली को भी सुलझाता है कि सबसे पुराने कोंड्रयूल आज दुर्लभ क्यों हैं। इसका कारण यह है कि वे ऐसे पिंडों के भीतर समा गए जो बाद में पूरी तरह पिघल गए और अपनी मूल बनावट खो बैठे।
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