टीबी ने छीनी चलने की ताकत, निशाने ने दिलाई पहचान: काशी की सुमेधा जापान में खेलेंगी पैरा एशियाई निशानेबाजी

वाराणसी। जिस उम्र में बच्चे मैदान में दौड़ लगाते हैं, उसी उम्र में सुमेधा पाठक के पैरों ने साथ छोड़ दिया था। लेकिन दुर्गाकुंड के मानस नगर एक्सटेंशन में रहने वाली इस बेटी ने हार नहीं मानी। व्हीलचेयर पर बैठकर उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल का निशाना साधा और आज 19 पदकों की चमक के साथ वह जापान में होने वाली पैरा एशियाई निशानेबाजी प्रतियोगिता में देश का प्रतिनिधित्व करने जा रही हैं।
सुमेधा स्कूल के दिनों में एथलेटिक्स की तेज धावक थीं। कक्षा 10 तक उन्होंने दौड़ में कई पदक जीते। वर्ष 2013 में, जब वह कक्षा 10 में थीं, उन्हें मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी ने जकड़ लिया। लंबे इलाज के बाद जान तो बच गई, लेकिन कमर के नीचे का हिस्सा काम करना बंद कर चुका था। इसके बाद उनका जीवन व्हीलचेयर पर आ गया।
मैदान छूटा तो सुमेधा ने नया रास्ता चुना। कक्षा 11 में उन्होंने निशानेबाजी शुरू की और 10 मीटर एयर पिस्टल को अपना हथियार बनाया। पिता ब्रजेश पाठक ने बेटी के लिए घर में ही 10 मीटर की रेंज तैयार करा दी, ताकि अभ्यास में कोई बाधा न आए। सुमेधा रोजाना तीन घंटे से अधिक निशानेबाजी का अभ्यास करती हैं और एक घंटा योग को देती हैं।
पहला पदक 2018 में, अब तक 19
वर्ष 2018 में प्री-स्टेट प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने शुरुआत की। इसी साल चेन्नई में आयोजित जीवी मावलंकर प्रतियोगिता में उन्हें कांस्य पदक मिला। वर्ष 2021 में दूसरी पैरा नेशनल प्रतियोगिता में उन्होंने व्यक्तिगत स्वर्ण जीता। तीसरी और चौथी पैरा नेशनल प्रतियोगिताओं में उनके नाम तीन स्वर्ण पदक दर्ज हुए।
- वर्ष 2022 — फ्रांस के शातोरू में विश्व कप में रजत पदक
- वर्ष 2022 — कोरिया में टीम स्पर्धा का रजत पदक
- वर्ष 2023 — एशियाई खेलों के फाइनल में जगह, सातवां स्थान
- वर्ष 2026 — कोरिया में दो पदक, जिनमें 10 मीटर पिस्टल टीम स्पर्धा का रजत शामिल
14 से 24 अक्तूबर तक जापान में मुकाबला
जापान में 14 से 24 अक्तूबर तक होने वाली पैरा एशियाई निशानेबाजी प्रतियोगिता में सुमेधा 10 मीटर पिस्टल स्पर्धा में उतरेंगी। वह प्रदेश की पहली पैरा महिला खिलाड़ी हैं जिन्होंने यह मुकाम हासिल किया है। सुमेधा अपनी इस उपलब्धि का श्रेय बाबा काशी विश्वनाथ, माता-पिता और अपने प्रशिक्षक को देती हैं।
घर की छोटी सी रेंज से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का यह सफर आसान नहीं रहा। लगातार अभ्यास, अनुशासन और परिवार के सहयोग ने इसे संभव बनाया। प्रदेश के खेल जगत में उनकी इस उपलब्धि को पैरा खिलाड़ियों के लिए बड़ी प्रेरणा के रूप में देखा जा रहा है।
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