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हनुमान अंश: आस्था की सादगी ने रच दिया इतिहास

4 September 2026

AI News Reader

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हनुमान अंश: आस्था की सादगी ने रच दिया इतिहास

"सुनीत द्विवेदी"

सिनेमा का एक नियम बहुत पुराना है, बड़ा बजट, भव्य सेट, चमक-दमक वाले चेहरे और प्रचार का ऐसा शोर कि कान के पर्दे फट जाएं। मुंबई की मायावी दुनिया दशकों से इसी नुस्खे पर भरोसा करती आई है। पांच सौ करोड़, छह सौ करोड़ के तंबू गाड़े जाते हैं और उम्मीद की जाती है कि जनता टिकट खिड़की पर सम्मोहित होकर कतार लगा लेगी। लेकिन भारतीय जनमानस को केवल तकनीक के चश्मे से नहीं पढ़ा जा सकता। उसकी रगों में आस्था और सरोकार की एक अलग धारा बहती है।'हनुमान अंश' ने बॉक्स ऑफिस पर जो किया, वह महज किसी फिल्म का हिट होना भर नहीं है, वह बाज़ार के थोपे गए गणित के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा है।

जरा आंकड़ों के तराजू पर तौलिए। जब यह परियोजना ज़मीन पर उतरी, तो इसकी झोली में साधन कम और संकल्प अधिक था। कहा जा रहा है कि फिल्म का बजट महज 50 से 60 लाख रुपये के सीमित दायरे में समेटा गया था। कोई तामझाम नहीं, कोई विदेशी लोकेशन नहीं और न ही पीआर एजेंसियों का आक्रामक ढोल। लेकिन जब यह रूपहले पर्दे पर आई, तो इसने जो बवंडर उठाया, उसने ट्रेड पंडितों की सारी पोथियां फाड़ दीं। पहले हफ्ते की सुगबुगाहट देखते ही देखते जन-ज्वार में बदल गई।

फिल्म ने देश-विदेश के सिनेमाघरों से 100 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार समेट कर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया। यानी लागत का 150 से 200 गुना मुनाफा! अर्थशास्त्र की भाषा में इसे 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' कहते हैं, पर लोकभाषा में इसे 'जनता जनार्दन का वरदान' कहा जाता है। हाल के वर्षों में जहां सैकड़ों करोड़ फूंकने के बाद भी फिल्में औंधे मुंह गिरीं और निर्माताओं के पसीने छूट गए, वहीं 'हनुमान अंश' जैसी कृतियों ने साबित किया कि दर्शकों की जेब तक पहुंचने का रास्ता उनकी आत्मा से होकर गुजरता है।

"यहां न तो कोई हवाई वीएफएक्स था और न ही कोई नकली भव्यता। यहां थी पवनपुत्र के प्रति वह निश्छल भक्ति, जो भारत के गांव, देहात, कस्बों और शहरों के आम इंसान के दिल की धड़कन में बसी है। जब दर्शक थियेटर में बैठा, तो उसने स्क्रीन पर करोड़ों का बजट नहीं, अपनी आस्था का अक्स देखा। दादी-नानी से सुनी कहानियों का वही संकोच और वही तेज देखा। यही कारण था कि टिकट खिड़की पर न उम्र की सीमा रही, न वर्ग का भेद। पूरा परिवार एक साथ कतार में दिखा।यह परिघटना सिर्फ एक फिल्म की सफलता तक सीमित नहीं है। यह हमारे समय का एक सांस्कृतिक संदेश भी है। संदेश यह कि भारत का दर्शक अब खोखले दिखावे से ऊब चुका है। वह अपनी जड़ों की खुशबू ढूंढ रहा है। "

यदि आप ईमानदारी से, बिना किसी मिलावट के उसकी आस्था और संवेदना को छुएंगे, तो वह अपना दिल भी खोलेगा और अपनी जेब भी। 'हनुमान अंश' के ये आंकड़े सिर्फ रुपयों की गिनती नहीं हैं, यह उस भरोसे की रसीद हैं जो इस देश की जनता ने अपनी मौलिक संस्कृति पर एक बार फिर दर्ज कराई है। माया नगरी के कर्णधारों को अगर अब भी यह बात समझ नहीं आती, तो दोष दर्शकों का नहीं, उनकी अपनी दृष्टि का है।
(लेखक TV10 INDIA के संपादक हैं।)