बड़ा दिखेगा अफ्रीका, घटेगा अमेरिका-यूरोप का आकार: संयुक्त राष्ट्र ने बदला दुनिया का नक्शा, सदियों पुरानी धारणा टूटी

नई दिल्ली / न्यूयॉर्क:दुनिया को देखने का दशकों पुराना नजरिया अब आधिकारिक तौर पर बदलने जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने वैश्विक नक्शों में लंबे समय से चली आ रही भौगोलिक विसंगतियों को ठीक करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब तक दुनियाभर के स्कूलों, दफ्तरों और पाठ्यपुस्तकों में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक 'मर्केटर प्रोजेक्शन' (Mercator Projection) की जगह 'इक्वल-एरिया' (सटीक क्षेत्रफल वाले) नक्शों को प्राथमिकता दी जा रही है। इस नए नक्शे में अफ्रीका महाद्वीप अपने वास्तविक विशाल आकार में दिखाई देगा, जबकि अमेरिका, कनाडा, यूरोप और ग्रीनलैंड जैसे उत्तरी देशों का कृत्रिम रूप से बढ़ा हुआ आकार घट जाएगा।
मर्केटर नक्शे की क्या थी खामी?
1569 में गेरार्डस मर्केटर द्वारा तैयार किया गया नक्शा मूल रूप से समुद्री नाविकों के दिशा-निर्देश (नेविगेशन) के लिए बनाया गया था। इसकी सबसे बड़ी तकनीकी कमी यह थी कि इसने 3D गोल पृथ्वी को 2D सपाट कागज पर उतारते समय ध्रुवों (Poles) के पास स्थित देशों के आकार को बहुत बड़ा कर दिया और भूमध्य रेखा (Equator) के पास मौजूद देशों को सिकोड़ दिया।ग्रीनलैंड बनाम अफ्रीका: पुराने नक्शे में ग्रीनलैंड और अफ्रीका लगभग बराबर दिखते थे, जबकि हकीकत में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है।
यूरोप का प्रभुत्व
पुराने नक्शे में यूरोप आकार में वास्तविक क्षेत्रफल से कहीं अधिक विशाल और दुनिया के केंद्र में नजर आता था।उत्तर बनाम दक्षिण: उत्तरी गोलार्ध के विकसित देश दक्षिण के विकासशील देशों की तुलना में काफी बड़े और प्रभावशाली दिखते थे।
नए नक्शे में क्या बदला?
संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाए जा रहे वैकल्पिक मॉडल (जैसे 'गैल-पीटर्स' या 'ऑथोग्राफिक' प्रोजेक्शन) में हर देश और महाद्वीप को उसके वास्तविक भौगोलिक क्षेत्रफल (Land Area) के अनुपात में दिखाया गया है:विशाल अफ्रीका: नए नक्शे में अफ्रीका की वास्तविक विशालता साफ दिखती है। यह इतना बड़ा है कि इसमें पूरा संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, भारत और अधिकांश यूरोप एक साथ समा सकते हैं।छोटा हुआ ग्रीनलैंड और यूरोप: ग्रीनलैंड और उत्तरी अमेरिका का आकार सिमटकर अपने असली अनुपात में आ गया है। दक्षिण अमेरिका और एशिया की सही स्थिति भारत, ब्राजील और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का आकार अब नक्शे पर उनके वास्तविक जमीनी विस्तार के अनुसार संतुलित दिखेगा।
भौगोलिक से ज्यादा भू-राजनीतिक बदलाव
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव केवल भूगोल का नहीं, बल्कि मानसिकता का भी है। लंबे समय से आलोचकों का तर्क रहा है कि मर्केटर नक्शे ने अनजाने में "यूरो-केंद्रित" (Eurocentric) और पश्चिमी श्रेष्ठता की सोच को बढ़ावा दिया, जहां अमीर उत्तरी देशों को बड़ा और ताकतवर दिखाया गया, जबकि ग्लोबल साउथ (अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया) को हाशिए पर धकेल दिया गया।संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों और शैक्षणिक संस्थानों में इस नए मानक को लागू किए जाने से आने वाली पीढ़ियों को दुनिया का वास्तविक, निष्पक्ष और सटीक भौगोलिक स्वरूप देखने को मिलेगा।
