🔴 Latest
🔴 नेपाल-चीन सीमा पर भोटेकोशी नदी की बाढ़ ने मचाई भारी तबाही, 270 शव बरामद; 288 भारतीयों समेत 1,500 लोग लापता🔴 पहाड़ में दौड़ेगी रेल: 2028 तक ब्यासी पहुंचेगी ट्रेन, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग प्रोजेक्ट का काम अंतिम दौर में🔴 पहाड़ में दौड़ेगी रेल: 2028 तक ब्यासी पहुंचेगी ट्रेन, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग प्रोजेक्ट का काम अंतिम दौर में🔴 नेपाल-चीन सीमा पर भोटेकोशी नदी की बाढ़ ने मचाई भारी तबाही, 270 शव बरामद; 288 भारतीयों समेत 1,500 लोग लापता🔴 लंपी वायरस की आहट से सरकार अलर्ट: पशुओं के अंतर्राज्यीय परिवहन और प्रदर्शनियों पर एक महीने की रोक, टीकाकरण तेज🔴 नेपाल-चीन सीमा पर भोटेकोशी नदी की बाढ़ ने मचाई भारी तबाही, 270 शव बरामद; 288 भारतीयों समेत 1,500 लोग लापता🔴 पहाड़ में दौड़ेगी रेल: 2028 तक ब्यासी पहुंचेगी ट्रेन, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग प्रोजेक्ट का काम अंतिम दौर में🔴 पहाड़ में दौड़ेगी रेल: 2028 तक ब्यासी पहुंचेगी ट्रेन, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग प्रोजेक्ट का काम अंतिम दौर में🔴 नेपाल-चीन सीमा पर भोटेकोशी नदी की बाढ़ ने मचाई भारी तबाही, 270 शव बरामद; 288 भारतीयों समेत 1,500 लोग लापता🔴 लंपी वायरस की आहट से सरकार अलर्ट: पशुओं के अंतर्राज्यीय परिवहन और प्रदर्शनियों पर एक महीने की रोक, टीकाकरण तेज
Home /up

आंकड़ों का इंद्रजाल और न्याय का अकाल

21 April 2026

AI News Reader

खबर सुनें (Listen Now)

आंकड़ों का इंद्रजाल और न्याय का अकाल

सुनीत द्विवेदी
एडिटर
TV10 INDIA

देश 21 अप्रैल को सिविल सेवा दिवस मना रहा है। जश्न का माहौल है। लेकिन, इस जश्न के शोर में उन आंकड़ों की चीख सुनाई नहीं देती, जो हमारे 'स्टील फ्रेम' की असलियत बयान करते हैं। हम अक्सर उपलब्धियों के पहाड़ दिखाते हैं, पर उस खाई का क्या जो बढ़ती ही जा रही है?

भारत की विशाल आबादी को संभालने का जिम्मा जिन कंधों पर है, वे संख्या में ही कमजोर हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में प्रति 10 लाख की आबादी पर केवल 1,500 से 1,600 सरकारी कर्मचारी हैं, जबकि अमेरिका जैसे देशों में यह संख्या 5,000 के पार है। लेकिन क्या सिर्फ संख्या बढ़ना समाधान है?

असली समस्या 'अनुपात' की नहीं, 'अप्रोच' की है। सचिवालयों में फाइलें तो 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं, लेकिन जब वही फाइल किसी गरीब की पेंशन की होती है, तो उसकी गति कछुए से भी कम हो जाती है।

हर साल योजनाओं के लिए लाखों करोड़ आवंटित होते हैं, लेकिन नीति आयोग और अन्य संस्थाओं की रिपोर्टें अक्सर इशारा करती हैं कि निचले स्तर तक पहुंचते-पहुंचते 1 रुपया मात्र 15 पैसे रह जाता है (जैसा कभी पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा था)। आधुनिक भारत में यह तकनीक के बावजूद 20-25 पैसे से ऊपर नहीं बढ़ पाया।
जिलों में कलेक्टर के राजस्व न्यायालयों में लाखों मामले सालों से लंबित हैं। आंकड़े कहते हैं कि कई राज्यों में 50% से अधिक मामले सिर्फ तारीखों के इंतजार में दम तोड़ रहे हैं।

सिविल सेवा दिवस पर वीरता की कहानियां सुनाई जाएंगी, पर कोई उन 6,000 से अधिक IAS अधिकारियों की वास्तविक 'डिलीवरी' पर ऑडिट क्यों नहीं करता? केंद्र और राज्यों के बीच प्रतिनियुक्ति की रस्साकशी में नीति निर्माण अक्सर राजनीतिक फुटबॉल बन जाता है। यहां 'परफॉरमेंस' से ज्यादा 'पॉलिटिकल अलाइनमेंट' मायने रखने लगा है।

हम दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का गर्व करते हैं, लेकिन 'ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स' में 130 के आसपास क्यों अटके हैं? क्या हमारी ब्यूरोक्रेसी सिर्फ फाइलें मैनेज करना जानती है, भविष्य नहीं?

आंकड़े झूठ नहीं बोलते, लेकिन वे पूरी सच्चाई भी नहीं बताते। सच्चाई उस बूढ़ी मां की आंखों में है, जो आज भी राशन कार्ड के लिए एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के 50 चक्कर काटती है। अगर डिजिटल इंडिया के दौर में भी 'साहब' का सिग्नेचर पाने के लिए एड़ियां घिसनी पड़ें, तो समझ लीजिए कि हमारा 'स्टील फ्रेम' अब 'जंग लगा लोहा' बन चुका है।
मेडल बाद में बांटियेगा, पहले सिस्टम का 'कोलेस्ट्रॉल' कम कीजिये।