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पसीने की अर्थव्यवस्था और हमारे झूठे वादे

1 May 2026

AI News Reader

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पसीने की अर्थव्यवस्था और हमारे झूठे वादे

सुनीत द्विवेदी
एडिटर
TV10 INDIA

हम '5 ट्रिलियन इकोनॉमी' का ख्वाब देख रहे हैं, लेकिन क्या कभी सोचा है कि उस इकोनॉमी की ईंटें ढोने वाले के पैरों में चप्पल तक नहीं है? विकास की चमक में हम उन हाथों को भूल गए हैं, जिनके पसीने से जीडीपी का पहिया घूमता है।
देश की श्रम शक्ति की हालत किसी से छिपी नहीं है, बस हम अपनी आंखें मूंद लेते हैं। देश के कुल श्रम बल का लगभग 90% हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है। यानी करीब 45 से 50 करोड़ लोग बिना किसी लिखित अनुबंध, पीएफ या ग्रेच्युटी के काम कर रहे हैं। इनके लिए 'मजदूर दिवस' सिर्फ एक तारीख है, छुट्टी नहीं।

पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि आज भी एक बड़ा तबका 300 से 400 रूपए की दिहाड़ी पर गुजारा कर रहा है। जिस दौर में दूध और दाल की कीमतें आसमान छू रही हों, वहां इतनी कमाई में 'सम्मानजनक जीवन' सिर्फ एक किताबी जुमला है।
हर साल हजारों मजदूर निर्माण स्थलों और कारखानों में सुरक्षा मानकों की कमी के कारण जान गंवाते हैं। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, कार्यस्थल पर होने वाली दुर्घटनाओं में भारत की गिनती उच्च जोखिम वाले देशों में होती है।

मजदूर की 'मजबूरी' का फायदा उठाया जाता है। आंकड़े गवाह हैं कि उत्पादकता तो बढ़ी है, लेकिन उसके अनुपात में वास्तविक मजदूरी स्थिर रही है। कंपनियों का मुनाफा बढ़ा, सीईओ की सैलरी करोड़ों में पहुंची, लेकिन उस मशीन को चलाने वाले ऑपरेटर की थाली में रोटी उतनी ही रही।
यह कल्पना करना कि जिस देश में हर दूसरा कामगार अपनी अगली सुबह की कमाई को लेकर अनिश्चित हो, वह देश विश्व गुरु बन पाएगा। हम केवल 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' की बात करते हैं, लेकिन यह 'डिविडेंड' धीरे-धीरे 'डिजास्टर' में बदल रहा है।

भारत में महिला श्रम भागीदारी का ग्राफ अब भी निराशाजनक है। ऊपर से संकट यह कि समान काम के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 20% से 30% तक कम मजदूरी दी जाती है। यह आंकड़ा हमारे समाज की उस पितृ सत्तात्मक सोच पर तमाचा है, जो खुद को आधुनिक कहती है।

जब तक सरकारी नीतियां 'कैपिटल' (पूंजी) को खुश करने के लिए बनाई जाएंगी और 'लेबर' (श्रम) को सिर्फ एक लागत समझा जाएगा, तब तक यह शोषण जारी रहेगा। 25% श्रमिक आज भी गरीबी रेखा के इर्द-गिर्द जी रहे हैं। 10-12 घंटे की शिफ्ट अब सामान्य बन गई है।

लेकिन, याद रखिये। आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं होते, वे चीखें हैं, उन लोगों की, जिन्हें हमने व्यवस्था की फाइलों में दबा दिया है। पसीने की कद्र करना सीखिए, वरना याद रखिए कि इतिहास गवाह है, जब मजदूर का सब्र टूटता है, तो बड़े-बड़े साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।