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काशी में सोरहिया मेला शुरू: 16 दिन, 16 गांठ और 16 परिक्रमा के साथ महालक्ष्मी की आराधना

tv10 india news desk
By tv10 india news deskNewsroom19 September 2026

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काशी में सोरहिया मेला शुरू: 16 दिन, 16 गांठ और 16 परिक्रमा के साथ महालक्ष्मी की आराधना

वाराणसी। काशी के लक्ष्मीकुंड स्थित त्रिगुणात्मक सिद्धपीठ श्री महालक्ष्मी मंदिर में शनिवार से सोरहिया मेला शुरू हो गया। राधाष्टमी से पितृपक्ष की अष्टमी तक चलने वाले इस 16 दिवसीय मेले में महिलाएं व्रत रखकर मां लक्ष्मी और जिउतिया माता की आराधना करेंगी।

अष्टमी तिथि शुक्रवार दोपहर 1:02 बजे से शुरू होकर शनिवार अपराह्न 3:28 बजे तक रही। कई महिलाओं ने शुक्रवार को ही पूजन कर लिया, लेकिन उदया तिथि के अनुसार व्रत की औपचारिक शुरुआत शनिवार से मानी गई।

16 का अंक है पूरी परंपरा का आधार

इस व्रत में 16 अंक का विशेष महत्व है। मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय 'लिंगिया महाराज' के अनुसार व्रत की पूरी विधि इसी अंक पर टिकी है —

  • 16 गांठ वाला धागा धारण किया जाता है
  • मां लक्ष्मी की 16 परिक्रमा की जाती हैं
  • 16 बार आचमन किया जाता है
  • 16 चावल के दाने और 16 दूर्वा अर्पित किए जाते हैं
  • सोलह शृंगार की सामग्री चढ़ाई जाती है

महिलाएं प्रतिदिन लक्ष्मी मंदिर और मंदिर के दक्षिण दिशा में स्थापित जिउतिया माता का पूजन करती हैं। पूजन से पहले कुंड में स्नान का विधान है। अर्पित की जाने वाली सामग्री को कपड़े में बांधकर रोजाना चढ़ाया जाता है। महिलाएं हर दिन 'जीवित वाहन' की कथा सुनती हैं और संतान की लंबी आयु तथा सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

3 अक्तूबर को जिउतिया व्रत

जीवित्पुत्रिका यानी जिउतिया व्रत 3 अक्तूबर को रखा जाएगा। यह निर्जला व्रत होता है और इसका पारण 4 अक्तूबर को सुबह 7:28 बजे के बाद किया जाएगा। सोरहिया का दर्शन-पूजन 4 अक्तूबर को मां लक्ष्मी के शृंगार के साथ संपन्न होगा।

मेले की एक खास परंपरा गंगा की मिट्टी से बने मुखौटे की है। मां लक्ष्मी के चरणों से स्पर्श कराकर यह मुखौटा घर ले जाया जाता है और साल भर उसका पूजन होता है। अगले वर्ष पुराने मुखौटे को गंगा या लक्ष्मीकुंड में विसर्जित कर दिया जाता है।

महंत ने बताया कि इस वर्ष जिन महिलाओं का विवाह हुआ है, वे मलमास के कारण इस बार व्रत की शुरुआत नहीं कर सकेंगी। वे अगले वर्ष से व्रत आरंभ करेंगी।