विश्व पर्यटन दिवस पर बनाइए घूमने की योजना, सितंबर के आखिरी हफ्ते में खिल उठते हैं ये ठिकाने

नई दिल्ली। हर साल 27 सितंबर को विश्व पर्यटन दिवस मनाया जाता है। सितंबर का आखिरी हफ्ता घूमने के लिहाज से खास माना जाता है, क्योंकि मानसून के बाद हरियाली निखर आती है और पहाड़ी तथा ऐतिहासिक जगहों का मौसम सुहाना हो जाता है।
केरल
केरल इस मौसम में हरे-भरे नजारों से भर जाता है। मुन्नार की चाय बागानों से ढकी ढलानें और पहाड़ी नजारे यहां की पहचान हैं। अलप्पुझा की हाउसबोट यात्रा शांत बैकवॉटर का अनुभव कराती है। वायनाड में झरने और घने जंगल घूमने वालों को अपनी ओर खींचते हैं।
सिक्किम
सिक्किम में गंगटोक के स्थानीय बाजार और व्यू पॉइंट सैलानियों को पसंद आते हैं। पेलिंग से हिमालय की ऊंची चोटियों का नजारा दिखता है। राज्य के बौद्ध मठ और झीलें यात्रा को एक अलग ही रंग देते हैं।
राजस्थान
राजस्थान में जयपुर का आमेर किला और सिटी पैलेस इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों के लिए खास हैं। उदयपुर की झीलें और महल यात्रा को यादगार बनाते हैं। जोधपुर के किले और पुराने बाजार भी घूमने लायक हैं।
मेघालय
मेघालय में शिलॉन्ग की उमियम झील और व्यू पॉइंट सैलानियों को लुभाते हैं। चेरापूंजी के झरने इस मौसम में पूरे उफान पर रहते हैं। डावकी में उमंगोट नदी का पानी इतना साफ होता है कि नाव तैरती हुई नजर आती है।
घूमने की योजना बनाते समय मौसम की जानकारी, ठहरने की बुकिंग और स्थानीय यातायात के विकल्प पहले से देख लेना बेहतर रहता है। त्योहारों के मौसम में इन जगहों पर भीड़ बढ़ जाती है, इसलिए पहले से की गई तैयारी काम आती है।
लंबी छुट्टी न मिल पाए तो तीन से चार दिन की छोटी यात्रा भी इन जगहों का अच्छा अनुभव करा सकती है। स्थानीय खानपान, हस्तशिल्प और लोककला से जुड़ना ऐसी यात्राओं को और यादगार बना देता है।
क्यों मनाया जाता है यह दिन
विश्व पर्यटन दिवस मनाने का मकसद पर्यटन के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व की ओर ध्यान दिलाना है। किसी भी इलाके में सैलानियों के पहुंचने से होटल, परिवहन, गाइड, हस्तशिल्प और खानपान से जुड़े कारोबार को सीधा लाभ मिलता है।
पर्यटन स्थानीय संस्कृति को बचाए रखने में भी भूमिका निभाता है। लोकनृत्य, पारंपरिक व्यंजन और हस्तशिल्प जब सैलानियों तक पहुंचते हैं, तो उन्हें करने वाले कारीगरों और कलाकारों को नियमित आमदनी और पहचान दोनों मिलती है।
जिम्मेदार पर्यटन की बात भी इसी दिन के साथ जुड़ी रही है। कूड़ा न फैलाना, स्थानीय नियमों का पालन करना और संरक्षित इलाकों में तय सीमाओं का ध्यान रखना — ये छोटी बातें उन जगहों को अगली पीढ़ी के लिए बचाए रखने में मदद करती हैं।
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