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एक जिला दो उत्पाद: उत्तराखंड के 13 जिलों की नई पहचान बन रहे स्थानीय उत्पाद

tv10 india news desk
By tv10 india news deskNewsroom18 September 2026

AI News Reader

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एक जिला दो उत्पाद: उत्तराखंड के 13 जिलों की नई पहचान बन रहे स्थानीय उत्पाद

देहरादून। उत्तराखंड में 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' और 'वन डिस्ट्रिक्ट टू प्रोडक्ट्स' योजना राज्य के सभी तेरह जिलों में आकार ले रही है। इसके तहत स्थानीय उत्पादों को आधुनिक तकनीक, ब्रांडिंग, पैकेजिंग और डिजिटल विपणन से जोड़ा जा रहा है।

योजना का मकसद कारीगरों और किसानों की आमदनी बढ़ाना तथा पलायन पर अंकुश लगाना है। जिन इलाकों में स्थानीय उत्पाद को बाजार मिल रहा है, वहाँ लौटकर काम शुरू करने वालों की संख्या भी बढ़ी है, जिसे 'रिवर्स पलायन' कहा जा रहा है।

किस जिले की क्या पहचान

  • चंपावत — हिमालयी शहद, जहाँ क्लस्टर बनने के बाद किसानों की आय तीन गुना तक बढ़ी
  • उत्तरकाशी — सेब और लाल चावल, जिन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर दाम मिल रहे हैं
  • पिथौरागढ़ — ऊनी वस्त्र और मुनस्यारी राजमा, जिनसे हथकरघा बुनकरों तथा महिला स्वयं सहायता समूहों को काम मिला
  • देहरादून — बेकरी उत्पाद और मशरूम क्लस्टर, जिनसे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला
  • अल्मोड़ा — बाल मिठाई और ताम्र शिल्प, जो जिले की पारंपरिक पहचान हैं

तकनीक और पैकेजिंग से बदली तस्वीर

योजना के तहत सबसे बड़ा बदलाव उत्पादों की पैकेजिंग और ब्रांडिंग में आया है। पहले पहाड़ी उत्पाद स्थानीय बाजार तक ही सीमित रहते थे और उन्हें पहचान दिलाने वाला कोई ठप्पा नहीं होता था। अब मानक पैकेजिंग और डिजिटल मंचों पर उपलब्धता के कारण ये उत्पाद दूर के खरीदारों तक पहुँच रहे हैं।

क्लस्टर आधारित ढाँचे ने भी फर्क डाला है। एक ही उत्पाद से जुड़े किसानों और कारीगरों को समूह में जोड़ने से कच्चे माल की खरीद, प्रसंस्करण और बिक्री, तीनों स्तर पर लागत घटती है और मोलभाव की ताकत बढ़ती है।

महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी इस योजना का एक अहम पहलू है। ऊनी वस्त्र, शहद और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में ये समूह उत्पादन की मुख्य कड़ी बन चुके हैं, जिससे गाँवों में महिलाओं के लिए नियमित आमदनी का रास्ता खुला है।