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'डोडीराजा' की जन्मभूमि डोडीताल में गणेश जन्मोत्सव की भव्य शुरुआत, ढोल-दमाऊं की थाप और रासो-तांदी नृत्य के साथ निकली भव्य शोभायात्रा

tv10 india news desk
By tv10 india news deskNewsroom14 September 2026

AI News Reader

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'डोडीराजा' की जन्मभूमि डोडीताल में गणेश जन्मोत्सव की भव्य शुरुआत, ढोल-दमाऊं की थाप और रासो-तांदी नृत्य के साथ निकली भव्य शोभायात्रा

उत्तरकाशी।
घने बांज-बुरांश के जंगलों, शांत जलराशि और हिमालय की धवल चोटियों के बीच समुद्र तल से 3,024 मीटर की ऊंचाई पर स्थित डोडीताल इन दिनों आस्था के रंग में सराबोर है। मान्यता है कि यही वह पावन धरा है, जिसे भगवान गणेश की जन्मस्थली का गौरव प्राप्त है। इस पवित्र धाम में गणपति केवल एक आराध्य देव ही नहीं, बल्कि समूची घाटी के अधिष्ठाता 'डोडीराजा' के रूप में पूजे जाते हैं। गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर केलशू (कैलासू) घाटी के दस गांवों के ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ दस दिवसीय गणेश महोत्सव का भव्य शुभारंभ किया।

कंडार मंदिर से निकली भव्य शोभायात्रा, लोक संस्कृति की दिखी झलक

महोत्सव के पहले दिन कंडार देवता मंदिर से भगवान गणेश की भव्य शोभायात्रा निकाली गई। पारंपरिक वाद्य यंत्रों—ढोल-दमाऊं और रणसिंघा की रणभेरी जैसी गूंज के बीच निकली यह शोभायात्रा काशी विश्वनाथ मंदिर, मुख्य बाजार, बस अड्डा और भटवाड़ी रोड होते हुए नगर के विभिन्न हिस्सों से गुजरी।

शोभायात्रा में अगोड़ा, ढासड़ा, दंदालका, भंकोली, गजोली, नौगांव, सेकू और नाल्ड सहित आसपास के दर्जनों गांवों से सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण पारंपरिक परिधानों में पहुंचे। महिलाओं और युवाओं ने 'रासो' और 'तांदी' लोकनृत्य प्रस्तुत कर पहाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर की अनूठी छटा बिखेरी।

क्या है पौराणिक मान्यता: उबटन से बालक के सृजन से 'गजानन' बनने तक की कथा

स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, माता पार्वती ने स्नान से पूर्व अपने शरीर के उबटन (मैल) से एक बालक का पुतला बनाकर उसमें प्राण फूंके थे। माता ने इस बालक को द्वारपाल नियुक्त कर किसी को भी भीतर न आने देने का आदेश दिया। जब स्वयं देवाधिदेव महादेव वहां पहुंचे, तो बालक गणेश ने उन्हें भी माता की आज्ञा का हवाला देते हुए रोक दिया।

विवाद बढ़ने पर भगवान शिव ने त्रिशूल से बालक का मस्तक काट दिया। इसके बाद माता पार्वती के कुपित होने पर शिवजी ने बालक को पुनर्जीवन प्रदान किया और उनके धड़ पर गज (हाथी) का शीश लगाकर उन्हें 'गजानन' का स्वरूप दिया। उत्तरकाशी की केलशू घाटी के लोग दृढ़ता से मानते हैं कि यह आलौकिक घटना इसी डोडीताल के तट पर घटित हुई थी, जहां मां पार्वती आज भी 'मां अन्नपूर्णा' के रूप में विराजमान हैं।

स्कंद पुराण और ‘हिमगिरि विहार’ में मिलता है वर्णन

डोडीताल को गणेश जन्मभूमि मानने की इस लोक परंपरा की पुष्टि धार्मिक ग्रंथों से भी होती है।

स्कंद पुराण (केदारखंड): अध्याय 10 और 11 में गणेश जी के प्रकृति से प्राकट्य और उनकी चतुर्थी पूजा के विधान का विस्तार से उल्लेख है। स्थानीय परंपरा में डोडीताल को पौराणिक 'डुंडीसर' से जोड़कर देखा जाता है।

स्वामी तपोवन की पुस्तक: महान संत स्वामी तपोवन जी महाराज ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'हिमगिरि विहार' में भी डोडीताल और गणेश जन्म से जुड़े इस प्रसंग का प्रमुखता से उल्लेख किया है।

स्थानीय लोकगीत की ये पंक्तियां इस आस्था को सदियों से जीवंत बनाए हुए हैं:

"गणेश जन्मभूमि डोडीताल कैलासू, असी गंगा उद्गम अरू माता अन्नपूर्णा निवासू..."

10 दिनों तक अगोड़ा में पूजे जाएंगे डोडीराजा, अंतिम दिन होगा देव समागम

डोडीताल स्थित मां अन्नपूर्णा मंदिर के पुरोहित पं. संतोष खंडूड़ी ने बताया कि शोभायात्रा के बाद अब बेस कैंप अगोड़ा गांव में आगामी 10 दिनों तक भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे।

महोत्सव के अंतिम तीन दिनों में जनपद के विभिन्न गांवों से देवी-देवताओं की पवित्र डोलियों का भव्य समागम होगा। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रहेगी। महोत्सव के अंतिम दिन विभिन्न देवडोलियों के सानिध्य और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अगोड़ा गांव की पवित्र जलधारा में गणेश प्रतिमा स्थापित की जाएगी।