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महासू देवता के जागड़े में उमड़ा आस्था का सैलाब, जयकारों से गूंजा जौनसार-बावर; जानें मंदिर की अनोखी मान्यता

tv10 india news desk
By tv10 india news deskNewsroom14 September 2026

AI News Reader

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महासू देवता के जागड़े में उमड़ा आस्था का सैलाब, जयकारों से गूंजा जौनसार-बावर; जानें मंदिर की अनोखी मान्यता

विकासनगर: उत्तराखंड की देवभूमि अपनी धार्मिक परंपराओं, प्राचीन मंदिरों, लोक आस्थाओं और पर्व-त्योहारों के लिए देश-दुनिया में अलग पहचान रखती है। देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में भी महासू देवता के प्रति लोगों की गहरी आस्था है। भादो महीने में मनाया जाने वाला महासू देवता का जागड़ा पर्व यहां का प्रमुख धार्मिक आयोजन है। इस वर्ष 13-14 सितंबर को हनोल और थैना स्थित महासू मंदिरों में जागड़ा पर्व धूमधाम से मनाया गया।

रातभर हुआ महासू देवता का जागरण

रविवार रात को मुख्य मंदिर हनोल और थैना गांव स्थित द्वितीय सिद्ध पीठ महासू मंदिर में रात्रि जागरण का आयोजन किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे और पूरी रात भजन-कीर्तन व धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल हुए। सोमवार को थैना गांव स्थित महासू मंदिर में जागड़ा पर्व के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।

बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर वर्ग के लोग अपने ईष्ट देव के दर्शन के लिए पहुंचे। मंदिर परिसर में पूरे दिन धार्मिक माहौल बना रहा।

महासू देवता की डोली के दर्शन को उमड़ी भीड़

जागड़ा पर्व के दौरान महासू देवता की डोली को विधि-विधान के साथ मंदिर से बाहर निकाला गया। वाद्य यंत्रों की थाप और महासू महाराज के जयकारों से पूरा जौनसार-बावर भक्तिमय हो उठा।

इसके बाद देव डोली को पास स्थित देवता के पवित्र जल में स्नान कराया गया। स्नान के बाद डोली को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मंदिर परिसर में लाया गया। यहां महिलाओं ने हाथों में धूप लेकर पंक्तिबद्ध होकर देव डोली की पूजा-अर्चना की और अक्षत व घी से धार्मिक अनुष्ठान किए।

पालकी को कंधा लगाने के लिए श्रद्धालुओं में होड़

महासू देवता की पालकी को कंधा लगाने के लिए श्रद्धालुओं में उत्साह देखने को मिला। पूरे परिसर में लगातार 'महासू महाराज की जय' के जयकारे गूंजते रहे। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवधुन के दौरान कुछ श्रद्धालुओं पर देवता का अवतरण भी हुआ।

दर्शन के लिए देवता की पालकी को मंदिर परिसर के बीच देवदार की लकड़ी से बने विशेष आसन पर विराजमान किया गया। इसके बाद विधि-विधान से पालकी को वापस मंदिर में स्थापित किया गया।

क्या है महासू देवता और थैना मंदिर की प्राचीन मान्यता?

थैना मंदिर समिति के अध्यक्ष संजय भट्ट के अनुसार, हनोल धाम का जो महत्व है, वही महत्व थैना महासू मंदिर का भी माना जाता है। इसे थैनोड़ भी कहा जाता है।

लोक मान्यता के अनुसार, राजा सामूसाहू के अत्याचारों से परेशान होकर क्षेत्र के लोग हनोल पहुंचे और उन्होंने महासू महाराज से अपनी पीड़ा बताई। तब महाराज ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह स्वयं वहां आएंगे और विराजमान होंगे।

इसके बाद यह सवाल उठा कि महासू महाराज का मंदिर किस स्थान पर बनाया जाए। मान्यता है कि देवमालियों और देवबाकियों को बताया गया कि जिस गांव में महासू देवता की मूर्ति वाली कंडी नहीं उठेगी, उसी स्थान पर उनका निवास होगा। जब कंडी थैना पहुंची तो वह वहीं रुक गई। इसके बाद थैना में महासू देवता के मंदिर की स्थापना हुई।

चींटियों ने बनाया मंदिर का वास्तु? जानें अनोखी लोककथा

थैना महासू मंदिर से जुड़ी एक बेहद अनोखी लोक मान्यता भी प्रचलित है। बुजुर्गों के अनुसार, मंदिर का वास्तु यानी उसकी संरचना चींटियों द्वारा तैयार किए जाने की कथा सुनाई जाती है।

लोककथा में आगे बताया जाता है कि महासू महाराज के यहां विराजमान होने से पहले कई दिव्य संकेत मिले। कहा जाता है कि यहां फूल खिलेंगे, पानी निकलेगा और बकरी बघेरे को मारेगी। मान्यता है कि बाद में बकरी ने बघेरे को मार दिया और इसके बाद महासू महाराज का यहां निवास हुआ।

सच्चे मन से आने वाले श्रद्धालु की मनौती होती है पूरी

महासू देवता के प्रति स्थानीय लोगों की गहरी आस्था है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से महाराज के दरबार में आता है, वह खाली हाथ नहीं लौटता। इसी विश्वास के साथ जागड़ा पर्व के दौरान दूर-दूर से श्रद्धालु थैना और हनोल पहुंचते हैं।

स्थानीय निवासियों के मुताबिक, महासू महाराज का रात्रि जागरण जागड़ा पर्व की सबसे खास परंपराओं में से एक है। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं और देव पालकी के मंदिर से बाहर आने के बाद दर्शन करते हैं। इस बार भी सभी धार्मिक परंपराओं और विधि-विधानों का पालन करते हुए जागड़ा पर्व धूमधाम से संपन्न हुआ।