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उत्तराखंड में कूड़े के नियमों में बड़ा बदलाव: 4 हिस्सों में अलग करना होगा कचरा, लापरवाही पर लगेगा जुर्माना; जानिए नए रूल्स

9 September 2026

AI News Reader

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उत्तराखंड में कूड़े के नियमों में बड़ा बदलाव: 4 हिस्सों में अलग करना होगा कचरा, लापरवाही पर लगेगा जुर्माना; जानिए नए रूल्स

  • उत्तराखंड समेत पूरे देश में लागू हुए 'सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026'
  • गीला, सूखा, सैनिटरी और स्पेशल केयर— अब 4 कैटेगरी में बंटेगा घरों का कचरा
  • 'प्रदूषक भुगतान सिद्धांत' के तहत लगेगा जुर्माना, डीएम और पॉल्यूशन बोर्ड को मिले अधिकार
  • दिसंबर 2026 तक प्रदेश के 61 डंप साइट्स से 23 लाख मीट्रिक टन कचरा खत्म करने का टारगेट

देहरादून: अगर आप भी घर का सारा कचरा एक ही डस्टबिन में डालकर नगर निगम की गाड़ी में डाल देते हैं, तो सावधान हो जाइए. उत्तराखंड में अब यह आदत आपकी जेब पर भारी पड़ सकती है. केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से जारी 'सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026' प्रदेश में प्रभावी हो चुके हैं.

साल 2016 के पुराने नियमों में जहां कूड़े को सिर्फ 3 श्रेणियों में बांटा गया था, वहीं 2026 के नए नियमों के तहत अब कचरे को 4 अलग-अलग कैटेगरी में बांटना अनिवार्य कर दिया गया है. शहरी विकास विभाग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इन नियमों को जमीन पर उतारने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है.

अब 4 श्रेणियों में बांटना होगा कूड़ा: किस डिब्बे में क्या जाएगा?

नए नियमों के अनुसार, हर घर और प्रतिष्ठान को स्रोत (Source) पर ही कचरे को इन चार श्रेणियों में अलग-अलग रखना होगा:

  • गीला अपशिष्ट (Wet Waste): रसोई का गीला कचरा, फल-सब्जियों के छिलके, बचा हुआ खाना, मांस और पूजा के फूल आदि.
  • सूखा अपशिष्ट (Dry Waste): प्लास्टिक, कागज, कार्डबोर्ड, धातु, कांच, सूखी लकड़ी और रबर आदि.
  • स्वच्छता अपशिष्ट (Sanitary Waste): इस्तेमाल किए गए डायपर, सैनिटरी पैड्स, टैम्पोन और कंडोम आदि.
  • विशेष देखभाल अपशिष्ट (Special Care Waste): पेंट के खाली डिब्बे, सीएफएल/एलईडी बल्ब, ट्यूबलाइट, पारे वाले थर्मामीटर और एक्सपायर हो चुकी दवाइयां.

लापरवाही की तो लगेगा भारी जुर्माना, DM को मिले अधिकार

नए नियमों में 'प्रदूषक भुगतान सिद्धांत' (Polluter Pays Principle) को कड़ाई से लागू किया गया है. अगर कोई बिना रजिस्ट्रेशन काम करता है, गलत रिपोर्टिंग करता है, फर्जी दस्तावेज देता है या कचरा प्रबंधन के नियमों की अनदेखी करता है, तो राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) उस पर भारी पर्यावरण क्षतिपूर्ति (जुर्माना) लगाएगा.

इस व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत और नगर निकायों की जवाबदेही तय की गई है. साथ ही केंद्रीय व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अलावा जिलाधिकारियों (DM) को भी सीधी कार्रवाई करने के अधिकार दिए गए हैं.

नए नियमों में 'बल्क वेस्ट जनरेटर' की स्पष्ट परिभाषा तय की गई है:

  • जिनका क्षेत्रफल 20 हजार वर्ग मीटर से अधिक हो,
  • जिनकी रोजाना जल खपत 40 हजार लीटर से ज्यादा हो,
  • या जहां रोजाना 100 किलोग्राम से अधिक ठोस कचरा निकलता हो.

इनमें सरकारी विभाग, स्थानीय निकाय, पीएसयू, बड़े होटल, मॉल, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान और बड़ी आवासीय सोसायटियां शामिल हैं. इन सभी के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था की गई है. उत्तराखंड में अब तक ऐसे 1,058 बल्क वेस्ट जनरेटर चिह्नित किए जा चुके हैं.

उत्तराखंड में डोर-टू-डोर कलेक्शन: 600 नए 4-कंपार्टमेंट वाहन खरीदे जा रहे

  • कवरेज: राज्य के 1314 वार्डों में वर्तमान में 98.59 फीसदी घरों से 1515 वाहनों के जरिए डोर-टू-डोर कूड़ा उठाया जा रहा है.
  • नए वाहन: चारों श्रेणियों के कचरे को अलग-अलग रखने के लिए 4 कंपार्टमेंट वाले 600 से अधिक नए वाहनों की खरीद चल रही है.
  • डिजिटल ट्रैकिंग: सफाई व्यवस्था पारदर्शी रहे, इसके लिए सभी वाहनों में डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जा रहा है.
  • दैनिक उत्पादन: प्रदेश में रोजाना 1930 मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है, जिसमें से 1800 मीट्रिक टन प्रोसेस हो रहा है. इसके अलावा रोजाना 154 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरे में से 123 मीट्रिक टन की प्रोसेसिंग की जा रही है.

दिसंबर 2026 तक 23 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा होगा खत्म

शहरी विकास विभाग ने राज्य को कचरा मुक्त बनाने के लिए बड़ा लक्ष्य तय किया है. उत्तराखंड की 61 कूड़ा डंप साइट्स पर करीब 23 लाख मीट्रिक टन लिगेसी वेस्ट (बरसों पुराना कचरा) जमा है. सरकार ने फैसला लिया है कि दिसंबर 2026 तक इन सभी 61 डंप साइट्स को पूरी तरह साफ कर दिया जाएगा. इसके लिए सभी जिलों में 'डिस्ट्रिक्ट स्पेशल सेल' का गठन कर दिया गया है.

अधिकारी क्या बोले?

"उत्तराखंड में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 लागू हो चुके हैं. पहली बार कचरे को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है. यह पूरी व्यवस्था 'रिड्यूस, रियूज और रिसाइकल' (3R) और सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल पर आधारित है. नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने का कड़ा प्रावधान है. सभी संबंधित विभागों के नोडल अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जा चुका है और प्रदेश में 1,058 बल्क वेस्ट जनरेटर चिह्नित किए गए हैं."
पराग मधुकर धकाते, सदस्य सचिव, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड