🔴 Latest
🔴 'मेड इन उत्तराखंड' बनेगा ग्लोबल ब्रांड: कुमाऊं के उद्यमियों के साथ संवाद में सीएम धामी ने दिया हर समस्या के समाधान का भरोसा🔴 हरिद्वार के पेंटागन मॉल में नामी फूड आउटलेट पर छापा: सड़े प्याज से बन रहा था बर्गर, एक्सपायरी डेट मिटाकर बेच रहे थे रैप🔴 कोयंबटूर में भीषण अग्निकांड: एक के बाद एक फटे 7 गैस सिलेंडर, जलकर राख हुए 40 टिन शेड; टला बड़ा हादसा🔴 सोनिया गांधी की आत्मकथा 'Belonging' पर सियासी घमासान: भारत में प्रकाशन रुकने पर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा🔴 Best Time to Eat Rice: दोपहर या रात, किस समय चावल खाना है सबसे फायदेमंद? जानिए हेल्थ गाइड🔴 'मेड इन उत्तराखंड' बनेगा ग्लोबल ब्रांड: कुमाऊं के उद्यमियों के साथ संवाद में सीएम धामी ने दिया हर समस्या के समाधान का भरोसा🔴 हरिद्वार के पेंटागन मॉल में नामी फूड आउटलेट पर छापा: सड़े प्याज से बन रहा था बर्गर, एक्सपायरी डेट मिटाकर बेच रहे थे रैप🔴 कोयंबटूर में भीषण अग्निकांड: एक के बाद एक फटे 7 गैस सिलेंडर, जलकर राख हुए 40 टिन शेड; टला बड़ा हादसा🔴 सोनिया गांधी की आत्मकथा 'Belonging' पर सियासी घमासान: भारत में प्रकाशन रुकने पर कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरा🔴 Best Time to Eat Rice: दोपहर या रात, किस समय चावल खाना है सबसे फायदेमंद? जानिए हेल्थ गाइड
Home /uk

नेपाल में तबाही के पीछे भूकंप नहीं, हैंगिंग ग्लेशियर का टूटना! वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा; भारत के लिए भी खतरे की घंटी

29 August 2026

AI News Reader

खबर सुनें (Listen Now)

नेपाल में तबाही के पीछे भूकंप नहीं, हैंगिंग ग्लेशियर का टूटना! वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा; भारत के लिए भी खतरे की घंटी

देहरादून:
नेपाल के रसुवा और धाडिंग जिले में आई विनाशकारी बाढ़ और भारी तबाही के कारणों को लेकर भूवैज्ञानिकों ने बड़ा खुलासा किया है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG), देहरादून के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस भीषण आपदा का कारण भूकंप नहीं, बल्कि 'हैंगिंग ग्लेशियर' (Hanging Glacier) का टूटना और आइस एवलांच (हिमस्खलन) है। इस हिमस्खलन के मलबे से नदी का प्रवाह रुकने के बाद बने अस्थायी बांध के फटने से निचले इलाकों में भयंकर 'फ्लैश फ्लड' (अचानक आई बाढ़) आ गई।

आइस एवलांच से बना प्राकृतिक बांध, फिर फूटा सैलाब

वाडिया संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता ने बताया कि प्रारंभिक अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि ग्लेशियर क्षेत्र में आइस एवलांच की गतिविधि हुई।

लंगटांग के दूसरी तरफ जहां से यह हिस्सा टूटा है, वहां 'हैंगिंग ग्लेशियर' स्थित है, जिसके टूटने की आशंका वर्तमान में काफी अधिक रहती है।

ग्लेशियर से भारी मात्रा में बर्फ, चट्टानें और मलबा नीचे गिरा, जिसने नदी के रास्ते में प्राकृतिक अवरोध (डैमिंग) पैदा कर दिया।

कुछ देर पानी रुकने के बाद जब यह अस्थायी बांध टूटा, तो भारी मात्रा में पानी, मिट्टी और विशालकाय पत्थर फ्लैश फ्लड के रूप में निचले इलाकों (डाउनस्ट्रीम) की ओर बह निकले। आगे चलकर अन्य नदियों का पानी मिलने से सैलाब और अधिक विकराल हो गया।

भूकंप नहीं था आपदा का कारण: डॉ. विनीत गहलोत

संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत ने स्पष्ट किया कि शुरुआती दौर में घटना के पीछे भूकंप आने की आशंका जताई जा रही थी, लेकिन तकनीकी जांच और डेटा विश्लेषण के बाद यह साफ हो गया है कि इस तबाही का कारण भूकंप नहीं था।

ग्लेशियरों का पीछे खिसकना और लूज मैटेरियल बना खतरा

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यावरण विशेषज्ञ प्रो. राकेश कुमार मैखुरी और वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तरह की आपदाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और ग्लोबल वार्मिंग सबसे बड़ा कारक हैं।

बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघलकर पीछे (Recede) खिसक रहे हैं और अपने पीछे भारी मात्रा में ढीला मलबा (Loose Material/Moraine) छोड़ रहे हैं।

इस मलबे में पानी सोखने की क्षमता बेहद कम होती है। बारिश या बर्फबारी के दौरान यह ढीला मलबा तेजी से खिसककर नदियों में गिरता है, जिससे धाराएं बाधित हो जाती हैं।

हिमालय की संकरी घाटियों और खड़ी ढलानों पर जब हजारों टन बर्फ और मलबा अचानक गिरता है, तो कुछ ही मिनटों में प्रलयंकारी स्थिति बन जाती है।

भारत के हिमालयी राज्यों के लिए बड़ा सबक और चेतावनी

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि नेपाल जैसी आपदाओं की पुनरावृत्ति भविष्य में भारत के हिमालयी राज्यों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश) में भी हो सकती है।

28,043 ग्लेशियर झीलें चिन्हित: राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) ने भारत में 28,043 ग्लेशियर झीलों की पहचान की है, जिनमें से अधिकांश हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हैं।

निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली जरूरी: लगातार बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और झीलों की सेटेलाइट व जमीनी स्तर पर 24x7 निगरानी और मजबूत 'अर्ली वॉर्निंग सिस्टम' (Early Warning System) स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता है।