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मुंडकटिया मंदिर: उत्तराखंड में स्थित दुनिया का इकलौता धाम, जहां पूजे जाते हैं 'बिना सिर' वाले गणेश जी; जानें रहस्य और पौराणिक कथा

By Alpana Dwivedi14 September 2026

AI News Reader

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मुंडकटिया मंदिर: उत्तराखंड में स्थित दुनिया का इकलौता धाम, जहां पूजे जाते हैं 'बिना सिर' वाले गणेश जी; जानें रहस्य और पौराणिक कथा

रुद्रप्रयाग (केदारघाटी)।
पूरी दुनिया में भगवान श्रीगणेश की पूजा उनके गजमुख (हाथी के मुख वाले) स्वरूप ‘गजानन’ के रूप में की जाती है। लेकिन देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में एक ऐसा अलौकिक और रहस्यमयी मंदिर है, जहां गणपति किसी मुख के साथ नहीं, बल्कि बिना सिर (केवल धड़) के रूप में पूजे जाते हैं।

केदारनाथ यात्रा मार्ग पर सोनप्रयाग और गौरीकुंड के बीच स्थित इस पवित्र स्थल को 'मुंडकटिया मंदिर' (Mundkatiya Temple) के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि यह वही ऐतिहासिक व पावन स्थान है, जहां देवाधिदेव महादेव ने भगवान गणेश का मस्तक (शीश) अपने त्रिशूल से काटा था।

क्यों पड़ा ‘मुंडकटिया’ नाम?

'मुंडकटिया' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘मुंड’ (अर्थात सिर) और ‘कटिया’ (अर्थात कटना)। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी स्थान पर गणेश जी का शीश उनके धड़ से अलग हुआ था, जिसके चलते सदियों से इस स्थान और मंदिर का नाम 'मुंडकटिया' पड़ गया।

यहाँ गर्भगृह में भगवान गणेश की एक प्राचीन पाषाण प्रतिमा स्थापित है, जिस पर सिर नहीं है। श्रद्धालु यहाँ उनके इसी अलौकिक 'धड़ रूप' के दर्शन कर उनका आशीर्वाद लेते हैं।

क्या है पौराणिक प्रसंग: गौरीकुंड से जुड़ा है इतिहास

धार्मिक मान्यताओं और स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार:

माता पार्वती का उबटन: मां पार्वती जब पास ही स्थित 'गौरीकुंड' (तप्त कुंड) में स्नान करने जा रही थीं, तब उन्होंने अपने शरीर के मैल/उबटन से एक बालक की रचना कर उसमें प्राण फूंके और उन्हें गुफा के द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया।

महादेव का आगमन और विवाद: कुछ समय बाद जब भगवान शिव वहां पहुंचे, तो बालक गणेश ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें भीतर जाने से रोक दिया। शिवजी के समझाने के बाद भी जब बालक नहीं माना, तो शिवगणों और बालक के बीच युद्ध हुआ।

त्रिशूल से काटा शीश: बालक के अदम्य साहस को देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल के प्रहार से बालक का शीश धड़ से अलग कर दिया। माना जाता है कि त्रिशूल का यह प्रहार इसी मुंडकटिया नामक स्थान पर हुआ था।

हाथी का शीश और गजानन स्वरूप: पुत्र की दशा देखकर जब मां पार्वती ने संहारक रूप धारण कर लिया, तब देवताओं की प्रार्थना पर महादेव ने उत्तर दिशा की ओर सबसे पहले मिले प्राणी (गज यानी हाथी के बच्चे) का शीश लाकर बालक के धड़ पर स्थापित किया और उन्हें पुनर्जीवन देकर 'प्रथम पूज्य' का वरदान दिया।

केदारनाथ जाने वाले श्रद्धालुओं की गहरी आस्था

मुंडकटिया मंदिर सोनप्रयाग से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर पैदल/वाहन मार्ग के समीप घने जंगलों और शांत वादियों के बीच स्थित है। केदारनाथ धाम जाने वाले कई तीर्थयात्री गौरीकुंड पहुंचने से पहले इस पावन स्थल पर रुककर प्रथम पूज्य के इस अनूठे स्वरूप के दर्शन करते हैं।

मान्यता है कि यहां दर्शन और पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार के वास्तु दोष, अहंकार और विघ्न-बाधाएं दूर हो जाती हैं। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से अद्वितीय है, बल्कि शिव-पार्वती और गणेश जी की लीला का एक जीवंत पौराणिक प्रमाण भी माना जाता है।

"नोट: यह आलेख पौराणिक कथाओं और लोक मान्यताओं पर आधारित है। tv10 india इसकी सत्यता या प्रामाणिकता का कोई दावा नहीं करता है।"