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भारत की विकास दर का अनुमान बढ़ाकर सात प्रतिशत, घरेलू मांग और बुनियादी ढांचे पर खर्च बना आधार

tv10 india news desk
By tv10 india news deskNewsroom20 September 2026

AI News Reader

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भारत की विकास दर का अनुमान बढ़ाकर सात प्रतिशत, घरेलू मांग और बुनियादी ढांचे पर खर्च बना आधार

नई दिल्ली। साख निर्धारण करने वाली कंपनी मूडीज ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान छह प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दिया है। कंपनी का कहना है कि घरेलू मांग और बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च अर्थव्यवस्था को लगातार सहारा दे रहे हैं।

कैलेंडर वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में देश की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही। यह कैलेंडर वर्ष 2025 की पूरी अवधि में दर्ज 7.3 प्रतिशत की दर से अधिक है।

किन वजहों से बढ़ा भरोसा

  • निजी उपभोग में मजबूती बनी हुई है
  • बुनियादी ढांचे पर लगातार सरकारी खर्च से सकल स्थायी पूंजी निर्माण बढ़ा है
  • निजी निवेश में तेजी आने की संभावना जताई गई है
  • सेवा क्षेत्र ने कठिन हालात में भी लचीलापन दिखाया है

जोखिम भी गिनाए गए

मूडीज ने भारत की बीएए3 रेटिंग की समीक्षा करते हुए कहा कि कर्ज का बोझ लगातार ऊंचा बना हुआ है और ब्याज लागत भी अधिक है। इसे बड़ा जोखिम बताया गया है।

कंपनी ने यह भी कहा कि यदि पश्चिम एशिया के संघर्ष का टिकाऊ समाधान नहीं निकला तो ऊर्जा कीमतें बढ़ सकती हैं। ऐसी स्थिति में चालू वित्त वर्ष के लिए अनुमानित 4.8 प्रतिशत की औसत सालाना महंगाई दर और ऊपर जा सकती है। वित्त वर्ष 2025-26 में यह दर 2.4 प्रतिशत रही थी।

अल नीनो और कच्चे तेल की कीमतों से जुड़े जोखिमों का भी जिक्र किया गया है। मानसून की चाल और तेल की कीमतें भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए हमेशा अहम रही हैं, क्योंकि इनका सीधा असर खाद्य महंगाई और आयात बिल पर पड़ता है।

ब्रोकरेज कंपनी जेफरीज का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में नाममात्र जीडीपी वृद्धि दर 11 से 12 प्रतिशत रह सकती है। कंपनी ने इसकी वजह मजबूत घरेलू मांग और बैंक ऋण में आई तेजी को बताया है।

विकास दर के अनुमान समय-समय पर संशोधित होते रहते हैं। आंकड़े आने, वैश्विक हालात बदलने और घरेलू मांग में उतार-चढ़ाव के हिसाब से इन्हें घटाया या बढ़ाया जाता है। अनुमान में बढ़ोतरी को आमतौर पर अर्थव्यवस्था को लेकर भरोसे का संकेत माना जाता है।

इन अनुमानों का असर विदेशी निवेश और उधारी की लागत पर भी पड़ता है। बेहतर अनुमान और स्थिर साख रेटिंग से कंपनियों के लिए बाहर से पूंजी जुटाना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है, जबकि कर्ज का ऊंचा बोझ इस राह में अड़चन बना रहता है।