चीन पर निर्भरता खत्म करने के लिए भारत का बड़ा दांव: म्यांमार से 'रेयर अर्थ मिनरल्स' लाने की तैयारी; PM मोदी और म्यांमार प्रमुख की बैठक में बनी सहमति

नई दिल्ली: हाई-टेक इंडस्ट्री, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और आधुनिक हथियारों के निर्माण में चीन के दबदबे को खत्म करने के लिए भारत ने बड़ा कूटनीतिक और रणनीतिक कदम उठाया है। भारत अब पड़ोसी देश म्यांमार के साथ मिलकर दुर्लभ खनिजों यानी 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' (Rare Earth Elements - REE) के खनन और आयात की तैयारी में जुट गया है। म्यांमार की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों के बीच इस बड़े प्रोजेक्ट को लेकर उच्च स्तरीय बातचीत अंतिम चरण में है।
हाल ही में नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में व्यापार, सुरक्षा और इन अहम खनिजों को सुरक्षित रूप से भारत लाने के कॉरिडोर पर विस्तृत चर्चा हुई है। म्यांमार में भारत के राजदूत ने भी पुष्टि की है कि दोनों देशों की सरकारें इस योजना पर तेजी से काम कर रही हैं।
भारत के लिए म्यांमार क्यों है सबसे बड़ा विकल्प?
- चीन का एकाधिकार: दुनिया भर में रेयर अर्थ खनिजों की 70% से अधिक प्रोसेसिंग और सप्लाई पर अकेले चीन का नियंत्रण है। हाल के दिनों में चीन ने इन खनिजों के निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं।
- म्यांमार की ताकत: म्यांमार इन दुर्लभ खनिजों का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।
- नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन: भारत अपने इस राष्ट्रीय मिशन के तहत घरेलू उद्योगों को कच्चा माल सुनिश्चित करने के लिए सप्लाई चेन को चीन से अलग (डी-रिस्क) करना चाहता है।
स्मार्टफोन से लेकर मिसाइल तक: क्यों जरूरी हैं ये दुर्लभ खनिज?
रेयर अर्थ एलिमेंट्स आधुनिक तकनीक की रीढ़ हैं। इनका उपयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में अनिवार्य है:
- इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EV) और बैटरी: ई-वाहनों की शक्तिशाली मोटर और बैटरी पैक बनाने में।
- स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स: सेमीकंडक्टर, स्क्रीन और माइक्रोचिप्स के निर्माण में।
- ग्रीन एनर्जी: सोलर पैनल्स और पवन चक्कियों (विंड टर्बाइन) के कंपोनेंट्स में।
- डिफेंस और हथियार: फाइटर जेट्स, रडार, गाइडेड मिसाइल सिस्टम और लेजर गाइडेड हथियारों में।
योजना बड़ी, लेकिन जमीन पर हैं दो सबसे बड़ी चुनौतियां:
1. विद्रोही गुटों का कब्जा (गृहयुद्ध का संकट):
म्यांमार के जिन इलाकों में ये खदानें मौजूद हैं, उनमें से ज्यादातर पर म्यांमार की सेना का नहीं, बल्कि स्थानीय विद्रोही गुटों जैसे काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी (KIA) का नियंत्रण है। सेना और विद्रोहियों के बीच जारी संघर्ष के बीच खदानों से सुरक्षित माल निकालना और सप्लाई लाइन बनाए रखना सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती होगी।
2. दुर्गम इलाका और इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी:
खनिज संपदा से समृद्ध यह पूरा क्षेत्र ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा है। वहां पक्की सड़कों, रेलवे और आधुनिक परिवहन की भारी कमी है, जिससे खनन सामग्री को बंदरगाहों या भारतीय सीमा तक पहुंचाना काफी जटिल काम है।
