हिमालयी महाकुंभ: चमोली के कुरुड़ से कैलाश धाम के लिए रवाना हुई मां नंदा की 'बड़ी जात' यात्रा; 30 सितंबर को होमकुंड में होगा समापन

चमोली (उत्तराखंड)। 'हिमालयी महाकुंभ' के नाम से विख्यात मां नंदा देवी की ऐतिहासिक 'बड़ी जात यात्रा' शनिवार को चमोली जिले के सिद्धपीठ कुरुड़ से विधिवत पूजा-अर्चना के बाद कैलाश के लिए रवाना हो गई। जैसे ही मां नंदा की डोली ने प्रस्थान किया, पूरा क्षेत्र 'जय मां नंदा' के गगनभेदी जयकारों और पारंपरिक ढोल-दमाऊं की थाप से गूंज उठा। नम आंखों से श्रद्धालुओं ने अपनी ईष्टदेवी को मायके से ससुराल (कैलाश) के लिए विदा किया।
12 वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित हो रही इस पावन यात्रा में शामिल होने के लिए राज्यभर से हजारों की संख्या में श्रद्धालु कुरुड़ पहुंचे हैं।
280 किमी की विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा
मां नंदा की यह यात्रा विश्व की सबसे कठिन और लंबी (करीब 280 किलोमीटर) पैदल यात्राओं में गिनी जाती है। आम तौर पर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली लोकजात यात्रा केवल 'वेदनी कुंड' तक ही जाती है, लेकिन 12 वर्ष बाद हो रही इस 'बड़ी जात' का मार्ग बढ़ाते हुए डोली को उच्च हिमालयी क्षेत्र होमकुंड तक ले जाया जाएगा। यात्रा विभिन्न दुर्गम पड़ावों, बुग्यालों और गांवों से होकर गुजरेगी, जहां जगह-जगह ग्रामीण मां का स्वागत करेंगे। 30 सितंबर को होमकुंड में मुख्य धार्मिक अनुष्ठान के साथ इस यात्रा का विधि-विधान से समापन होगा।
इस बार दो यात्राओं की पृष्ठभूमि: जानें क्या है 'बड़ी जात' और 'राजजात' का विवाद
उत्तराखंड की इस लोक परंपरा में इस वर्ष दो अलग-अलग स्वरूप देखने को मिले हैं, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- नौटी समिति द्वारा यात्रा स्थगित करना: नौटी आयोजन समिति इस वर्ष 'नंदा राजजात' की तैयारी कर रही थी, लेकिन मलमास (अधिकमास) का हवाला देते हुए उन्होंने यात्रा को स्थगित करने का फैसला लिया।
- कुरुड़ पक्ष का रुख और ऐतिहासिक दावा: कुरुड़ क्षेत्र के हक-हकूकधारियों और मंदिर समिति ने यात्रा स्थगित करने का विरोध किया। कुरुड़ पक्ष का मानना है कि इस यात्रा का मूल और पारंपरिक नाम 'बड़ी जात' ही है, जिसे बाद के दौर में राजपरिवार से जोड़कर 'राजजात' नाम दिया गया।
- महत्व और परंपरा की अनदेखी का आरोप: कुरुड़ पक्ष का कहना है कि पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था में उनकी भूमिका सबसे प्रमुख रही है, लेकिन कालांतर में नौटी और कांसुआ के कुंवरों का प्रभाव अधिक बढ़ गया और कुरुड़ की उपेक्षा हुई। इसके अलावा, यात्रा के शुरुआती पड़ाव ईड़ाबधाड़ी को लेकर भी मतभेद सामने आए।
नौटी समिति द्वारा यात्रा टाल दिए जाने के बाद, कुरुड़ पक्ष ने अपनी सदियों पुरानी लोक परंपरा और आस्था को निरंतर रखते हुए तय समय पर स्वयं 'बड़ी जात यात्रा' निकालने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।
भक्तिमय हुआ समूचा हिमालयी क्षेत्र:
डोली के प्रस्थान के साथ ही पूरे चमोली जनपद में उत्सव जैसा माहौल है। भक्तजन मां नंदा के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं और यात्रा दल के साथ हिमालय के दुर्गम पथ की ओर अग्रसर हैं।
