हरिद्वार में पितृ पक्ष शुरू, नारायणी शिला पर उमड़ने लगे श्रद्धालु: श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए देशभर से पहुंच रहे लोग; गया-बदरीनाथ से जुड़ी है पौराणिक मान्यता

हरिद्वार: पितरों की शांति और मोक्ष की कामना के साथ 16 दिवसीय पितृ पक्ष शुरू हो गया है। धर्मनगरी हरिद्वार में पितृ कर्म के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है। मायापुर स्थित नारायणी शिला मंदिर में श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करा रहे हैं।
मंदिर में नारायण बलि सहित अन्य पितृ कर्म भी कराए जाते हैं। पितृ पक्ष के दौरान नारायणी शिला में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।
गया में चरण, हरिद्वार में हृदय और बदरीनाथ में मस्तक की मान्यता
हरिद्वार की नारायणी शिला को पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। धार्मिक मान्यता और इससे जुड़ी पौराणिक कथा के कारण इस स्थान की अलग पहचान है।
मान्यता के अनुसार, बिहार के गया में भगवान विष्णु के चरण, हरिद्वार की नारायणी शिला में उनका हृदय और कंठ से नाभि तक का हिस्सा तथा बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल में उनका मस्तक विराजमान है। इसी मान्यता के चलते इन तीनों स्थानों पर पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मकांड का विशेष महत्व बताया जाता है।
गयासुर की कथा से जुड़ा है नारायणी शिला का इतिहास
नारायणी शिला मंदिर की पौराणिक कथा गयासुर और भगवान विष्णु से जुड़ी है। प्राचीन नारायणी शिला (प्रेत शिला) मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज कुमार त्रिपाठी के मुताबिक, वायु पुराण में गयासुर से जुड़ी कथा का उल्लेख मिलता है।
कथा के अनुसार, नारद जी की प्रेरणा से गयासुर भगवान विष्णु से बैर करने के लिए बद्रिकाश्रम गया था। वहां भगवान विष्णु के दर्शन नहीं होने पर गयासुर ने उनके श्रीविग्रह को लेकर जाने का प्रयास किया। इसके बाद भगवान विष्णु ने उसके केश पकड़कर उसे नीचे पटक दिया।
धार्मिक मान्यता के मुताबिक, इसी दौरान भगवान विष्णु के श्रीविग्रह के अलग-अलग हिस्से तीन प्रमुख स्थानों पर गिरे। भगवान विष्णु का मस्तक बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल, हृदय और कंठ से नाभि तक का हिस्सा हरिद्वार की नारायणी शिला और चरण बिहार के गया में गिरे।
कहा जाता है कि गयासुर के भगवान विष्णु के चरणों में पहुंचने के बाद उसे मोक्ष प्राप्त हुआ। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इन तीनों स्थानों पर वास करने का आशीर्वाद दिया और यहां पितरों की पूजा-अर्चना करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
एक लोटा जल चढ़ाने की भी धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के हृदय में माता लक्ष्मी का निवास है। इसलिए नारायणी शिला पर किए जाने वाले श्राद्ध और पितृ कर्म को विशेष महत्व दिया जाता है।
यहां श्राद्ध कर्म, पिंडदान, तर्पण और नारायण बलि जैसी पूजा कराई जाती है। इसके अलावा मान्यता है कि श्रद्धा से पितरों को याद करते हुए यहां एक लोटा जल अर्पित करने से भी उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मृत्यु तिथि के अनुसार किया जाता है श्राद्ध और तर्पण
नारायणी शिला मंदिर के मुख्य पुजारी मनोज त्रिपाठी के अनुसार, पितृ पक्ष में लोग अपने पितरों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करते हैं। दूर-दराज से श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त विभिन्न कर्मकांड कराने के लिए हरिद्वार पहुंचते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या के दिन मंदिर में विशेष भीड़ जुटती है। इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना और पितृ कर्म के लिए पहुंचते हैं।
16 दिन तक जारी रहेगा पितृ कर्म का सिलसिला
पितृ पक्ष शुरू होते ही नारायणी शिला मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी है। अगले 16 दिनों तक यहां श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और अन्य पितृ कर्म कराए जाएंगे।
नारायणी शिला मंदिर में भगवान विष्णु के कंठ से लेकर नाभि तक के हिस्से के शिला रूप में विराजमान होने की धार्मिक मान्यता है। पितृ कर्म पूरा करने के बाद श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर में पहले श्रद्धालुओं के पितरों के नाम से अलग-अलग स्थान बनाए जाते थे। समय के साथ ऐसे स्थानों की संख्या बढ़ने से मंदिर परिसर में जगह कम हो गई। इसके चलते अब नए पितरों के नाम से अलग स्थान उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं।
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