पितृ पक्ष 26 सितंबर से शुरू: 16 दिनों तक चलेगा पूर्वजों के तर्पण का महापर्व; देखें संपूर्ण श्राद्ध कैलेंडर और जानें पितृ दोष के लक्षण

धर्म डेस्क: सनातन धर्म में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का महापर्व 'पितृ पक्ष' (श्राद्ध पक्ष) इस वर्ष 26 सितंबर से शुरू होने जा रहा है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होने वाला यह 16 दिवसीय महाअनुष्ठान 10 अक्टूबर को सर्वपितृ विसर्जन अमावस्या के साथ संपन्न होगा। धर्म शास्त्रों के अनुसार, इन 16 दिनों में देवलोक से पूर्वज धरती पर अपने वंशजों के निकट आते हैं। श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन से पितृ तृप्त होकर परिवार को सुख-समृद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद देते हैं।
खगोलीय और ज्योतिषीय दृष्टि से क्यों खास है यह समय?
पितृ पक्ष केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण खगोलीय और ब्रह्मांडीय घटना भी है।
- न्यूनतम होती है दूरी: वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य-चंद्रमा एक विशेष कोणीय स्थिति में आते हैं, तब पृथ्वी और पितृलोक के बीच की दूरी न्यूनतम हो जाती है। इससे पूर्वजों की सूक्ष्म ऊर्जा सीधे वंशजों से जुड़ पाती है।
- कर्म और तीन गतियां: शास्त्रों में कर्मों के आधार पर आत्मा की तीन गतियां बताई गई हैं—ऊर्ध्व गति (स्वर्ग या उच्च लोक), अधोगति (निम्न योनि) और स्थिर गति (पुनः मानव योनि)। श्राद्ध कर्म के जरिए आत्मा को उच्च लोक की यात्रा (मोक्ष) में मदद मिलती है।
ग्रहों से समझिए पितृ दोष का गणित
ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों का हमारे पूर्व जन्म के कर्मों और पितरों से सीधा संबंध माना गया है:
- शनि देव: शनि का संबंध पूर्व जन्म के संचित कर्मों और पितरों की स्थिति से होता है। कुंडली में शनि का शुभ होना अच्छे पूर्व कर्मों का प्रतीक है।
- राहु और केतु: राहु पूर्वजों के ऋण और दायित्वों को दर्शाता है, जबकि केतु मोक्ष और पितरों की मुक्ति का कारक है। यदि कुंडली में सूर्य या शनि का राहु से अशुभ संबंध बने, तो पितृ दोष का निर्माण होता है।
- देवगुरु बृहस्पति: यदि कुंडली में गुरु (बृहस्पति) मजबूत स्थिति में हों, तो पितृ दोष के दुष्प्रभावों से सुरक्षा और मुक्ति मिलती है।
कुंडली में 'पितृ दोष' के 8 प्रमुख लक्षण
यदि किसी व्यक्ति के जीवन में लगातार निम्नलिखित समस्याएं आ रही हैं, तो यह कुंडली में पितृ दोष का संकेत हो सकता है:
- वैवाहिक जीवन में लगातार अशांति और योग्य संतान का सुख न मिलना।
- अच्छे संस्कारों के बावजूद बच्चों का गलत संगत में पड़ना या भटकना।
- परिवार में किसी सदस्य को लंबी बीमारी रहना या अकाल मृत्यु (दुर्घटना/आत्महत्या) होना।
- नौकरी, आजीविका और व्यापार में लगातार अकारण भारी नुकसान होना।
- घर में बिना बात के कलह-क्लेश और अशांति का माहौल बने रहना।
- जीवन में सुख-समृद्धि का बहुत अल्पकालिक होना और अचानक संकट आना।
- कड़ी मेहनत के बाद भी जीवन में हमेशा दरिद्रता, अभाव और असफलता का सामना करना।
- सिर पर लगातार कर्ज का भारी बोझ बने रहना और आर्थिक रुकावटें आना।
श्राद्ध और पिंडदान का महत्व: 'अपराह्न काल' में ही क्यों करें तर्पण?
श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को ही 'श्राद्ध' कहा जाता है। इसमें पके हुए अन्न को गोलाकार (पिंड) बनाकर पितरों को अर्पण करने को 'पिंडदान' कहते हैं।
शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि श्राद्ध और तर्पण का कार्य हमेशा 'अपराह्न काल' (दोपहर के समय) में ही किया जाना चाहिए, क्योंकि यही समय पितरों की तृप्ति के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है।
पितृ पक्ष केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह अहसास कराने का पर्व है कि आत्मा शाश्वत है और देह त्यागने के बाद भी हमारे पूर्वजों का भावनात्मक जुड़ाव हमसे हमेशा बना रहता है। श्रद्धापूर्वक जल और अन्न का अर्पण करने से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होकर अपने जीवन में शांति और वंशवृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
पितृ पक्ष 2026: 16 दिनों का संपूर्ण श्राद्ध कैलेंडर (तिथिवार सूची)
श्राद्ध की तिथियां-
26 सितंबर, शनिवार पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर, रविवार प्रतिपदा श्राद्ध
28 सितंबर, सोमवार द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर, मंगलवार तृतीया श्राद्ध
30 सितंबर, बुधवार चतुर्थी श्राद्ध
1 अक्तूबर, गुरुवार पंचमी/ षष्ठी श्राद्ध (पंचमी तिथि दोपहर 12:35 बजे तक इसके पश्चात षष्ठी तिथि)
2 अक्तूबर, शुक्रवार सप्तमी श्राद्ध
3 अक्तूबर. शनिवार अष्टमी श्राद्ध
4 अक्तूबर, रविवार नवमी श्राद्ध
5 अक्तूबर, सोमवार दशमी श्राद्ध
6 अक्तूबर, मंगलवार एकादशी श्राद्ध
7 अक्तूबर, बुधवार द्वादशी श्राद्ध
8 अक्तूबर, गुरुवार त्रियोदशी श्राद्ध
9 अक्तूबर, शुक्रवार चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्तूबर, सर्वपितृ अमावस्या
प्रमुख तिथियों के खास नियम :
- मातृ नवमी (4 अक्टूबर): इस दिन परिवार की दिवंगत माताओं, बहुओं और बेटियों का श्राद्ध करने की परंपरा है। इसे 'अविधवा नवमी' या 'मातृ नवमी' कहा जाता है।
- एकादशी व द्वादशी (6 व 7 अक्टूबर): यह तिथि संन्यासियों, साधु-संतों और धार्मिक मार्ग पर रहे पूर्वजों के श्राद्ध के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है।
- चतुर्दशी श्राद्ध (9 अक्टूबर): इस दिन केवल उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु (दुर्घटना, विष, अस्त्र-शस्त्र या आत्महत्या आदि) हुई हो। सामान्य मृत्यु वालों का श्राद्ध इस दिन नहीं किया जाता।
सर्वपितृ अमावस्या (10 अक्टूबर): यदि किसी परिजन की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, या किसी कारणवश तय तिथि पर श्राद्ध छूट गया हो, तो अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है। इसे पितृ विसर्जन भी कहते हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए tv10india उत्तरदायी नहीं है।
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