अल्मोड़ा में उमड़ा जनसैलाब: भव्य शोभायात्रा और महाआरती के साथ नंदा देवी महोत्सव का हुआ समापन

अल्मोड़ा (उत्तराखंड)। उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक नंदा देवी मेला बुधवार को मां नंदा-सुनंदा की भव्य शोभायात्रा और प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ श्रद्धा एवं उल्लासपूर्ण वातावरण में संपन्न हो गया। अपनी लोक आराध्य मां नंदा को विदाई देने के लिए नगर व आसपास के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े।
बुधवार को विसर्जन से पूर्व चंद राजवंश के वंशज नरेंद्र चंद राज सिंह ने वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक विधि-विधान के साथ मां नंदा-सुनंदा की कदली वृक्षों से निर्मित प्रतिमाओं की विशेष पूजा-अर्चना की। इसके बाद डोले को मंदिर परिसर की परिक्रमा कराकर नगर भ्रमण के लिए रवाना किया गया।
नगर भ्रमण: इन रास्तों से होकर गुजरा मां का डोला
शाम के समय जैसे ही मां नंदा-सुनंदा का डोला नंदा देवी मंदिर से बाहर निकला, पूरा परिसर और बाजार "जय मां नंदा-सुनंदा" के गगनभेदी जयकारों से गूंज उठा।
- डोले की भव्य शोभायात्रा मंदिर परिसर से प्रारंभ होकर लाला बाजार और बंसल गली से होते हुए माल रोड पहुंची।
- माल रोड से डोला ड्यूयोलीपोखर पहुंचा, जहां मां की भव्य महाआरती उतारी गई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने छतों और सड़कों से डोले पर पुष्पवर्षा की।
- इसके उपरांत शोभायात्रा सीढ़ी बाजार, चौक बाजार, कचहरी बाजार और जौहरी बाजार होते हुए आगे बढ़ी। नगर के व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों ने जगह-जगह मां का स्वागत किया और आशीर्वाद लिया।
डोबानौला में हुआ प्रतिमाओं का विसर्जन
नगर के विभिन्न बाजारों का भ्रमण करने के बाद मां नंदा का डोला कैंट स्थित दुगलखोला के डोबानौला पहुंचा। यहां पूरी धार्मिक निष्ठा और विधि-विधान के साथ मां नंदा और सुनंदा की पवित्र मूर्तियों का विसर्जन किया गया। विसर्जन के उपरांत चंद वंशजों ने पुनः नंदा देवी मंदिर आकर परंपरा अनुसार पूजा-अर्चना संपन्न की।
15 सितंबर को शुरू हुआ था सात दिवसीय मेला
ऐतिहासिक नंदा देवी मेले का विधिवत शुभारंभ 15 सितंबर को हुआ था। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी धूम रही। मेले के दौरान स्थानीय कलाकारों की लोक प्रस्तुतियां, छोलिया नृत्य और धार्मिक आयोजनों ने दूर-दराज से आए पर्यटकों और श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
400 वर्षों से जारी है मेले और जागर गायन की परंपरा
साहित्यकारों और इतिहासकारों के अनुसार, अल्मोड़ा का यह नंदा देवी मेला करीब 400 वर्षों से अनवरत आयोजित होता आ रहा है।
17वीं शताब्दी में तत्कालीन चंद्रवंशी शासकों के शासनकाल में मल्ला महल से इस मेले की शुरुआत हुई थी।
यह मेला न केवल कुमाऊं की धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि देवभूमि की लोक-संस्कृति, इतिहास और सामूहिक स्मृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोने का सशक्त माध्यम भी है।
छानी-लवेशाल गांव के जागरिए निभाते हैं 400 साल पुरानी परंपरा
नंदा देवी मेले की मुख्य पहचान और आत्मा यहां का पारंपरिक 'जागर गायन' है। मेले की शुरुआत के साथ ही अल्मोड़ा के छानी-लवेशाल गांव के जागरिया परिवार मेले में पहुंचते हैं। यह परिवार पिछले 400 वर्षों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस परंपरा को जीवित रखे हुए है।
मेले के दौरान मां नंदा की जागर लगातार तीन पहर तक गाई जाती है। इस जागर में देवी-देवताओं की स्तुति, पौराणिक कथाओं, लोक मान्यताओं और चंद राजाओं के ऐतिहासिक प्रसंगों का सजीव वर्णन किया जाता है, जो उत्तराखंड की मौखिक लोक-संस्कृति की एक अनमोल धरोहर है।
डोला विसर्जन के साथ ही श्रद्धा, लोक संस्कृति और परंपराओं का यह महाकुंभ अगले वर्ष पुनः मिलने की कामना के साथ शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया।
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