ऋषि पंचमी व्रत कथा: क्यों रखा जाता है यह व्रत और कैसे मिला था ब्राह्मण कन्या को पापों से मुक्ति का वरदान? पढ़ें पौराणिक प्रसंग

ऋषि पंचमी का व्रत मुख्य रूप से जाने-अनजाने हुए पापों और रजस्वला (मासिक धर्म) दोष से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है। भविष्य पुराण और पद्म पुराण में इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।
पौराणिक व्रत कथा
प्राचीन काल में विदर्भ देश में उत्तंक (कुछ स्थानों पर सुमित्र) नाम के एक सदाचारी और तपस्वी ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी सुशीला के साथ रहते थे। उनके दो बच्चे थे— एक पुत्र और एक पुत्री। ब्राह्मण दंपति ने अपनी पुत्री का विवाह एक सुयोग्य ब्राह्मण युवक से किया।
लेकिन प्रारब्धवश विवाह के कुछ समय बाद ही पुत्री के पति का अल्पायु में निधन हो गया और वह विधवा हो गई। दुखी होकर वह अपने माता-पिता के घर लौट आई और गंगा तट पर एक कुटिया बनाकर प्रभु भक्ति में लीन रहने लगी।
अचानक शरीर पर पड़ गए कीड़े, व्याकुल हुई मां
एक रात जब पुत्री सो रही थी, तो उसकी मां सुशीला ने देखा कि उसके पूरे शरीर पर सूक्ष्म कीड़े रेंग रहे हैं और उसका शरीर क्षत-विक्षत हो रहा है। अपनी बेटी की यह दुर्दशा देखकर माता-पिता अत्यंत व्याकुल हो गए।
ब्राह्मणी रोते हुए अपने पति उत्तंक के पास पहुंची और कहा, "स्वामी! मेरी पुत्री ने कभी कोई पाप नहीं किया, फिर इसके साथ ऐसा घोर अन्याय और कष्ट क्यों हो रहा है?"
ध्यान में दिखा पूर्व जन्म का दोष
तपस्वी उत्तंक ने अपने नेत्र बंद कर समाधि लगाई और पुत्री के पूर्व जन्म के कर्मों को देखा। ध्यान पूरा होने के बाद उन्होंने अपनी पत्नी से कहा:
"प्रिये! हमारी पुत्री पूर्व जन्म में भी एक ब्राह्मणी थी। एक बार मासिक धर्म (रजस्वला) के दौरान इसने अज्ञानतावश पूजा और रसोई के पवित्र बर्तनों को स्पर्श कर दिया था। धर्मशास्त्रों के अनुसार, रजस्वला अवस्था में शुद्धि के नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है, जिसका इसने उल्लंघन किया था।
इतना ही नहीं, इस जन्म में भी इसने कभी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं रखा, जो ऐसे दोषों के निवारण का एकमात्र उपाय है। उसी रजस्वला दोष और मर्यादा के उल्लंघन के पाप स्वरूप आज इसके शरीर में कीड़े उत्पन्न हो रहे हैं।"
पिता ने बताया ऋषि पंचमी व्रत का विधान
माता-पिता के पूछने पर ऋषि उत्तंक ने इसका निवारण बताते हुए कहा कि यदि यह कन्या शुद्ध मन और श्रद्धा से भाद्रपद शुक्ल पंचमी को सप्तऋषियों का व्रत और पूजन करे, तो यह इस घोर पाप से मुक्त हो सकती है।
पिता के निर्देश पर पुत्री ने भाद्रपद शुक्ल पंचमी तिथि के दिन:
- पवित्र नदी में अपामार्ग (चिरचिटा) के पत्तों से स्नान किया।
- चौकी पर सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ) और देवी अरुंधती की स्थापना की।
- विधि-विधान से धूप, दीप, गंध, पीले पुष्प और कंदमूल अर्पित कर क्षमा-प्रार्थना की।
- पूरे दिन निराहार रहकर केवल बिना जुते हुए अन्न (पसई/तिन्नी के चावल) का फलाहार किया।
पाप मुक्त होकर मिला दिव्य स्वरूप
कथा के अनुसार, विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत और सप्तऋषियों की आराधना करने के प्रभाव से कन्या के शरीर के सारे कीड़े स्वतः ही नष्ट हो गए। उसका शरीर पहले की तरह दिव्य, स्वस्थ और कांतिवान हो गया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से उसे पूर्व जन्म के समस्त दोषों से मुक्ति मिल गई और अगले जन्म में उसने अखंड सौभाग्य प्राप्त किया।
धार्मिक महत्व:
मान्यता है कि जो भी स्त्री या पुरुष ऋषि पंचमी के दिन इस कथा का श्रवण करते हैं और सप्तऋषियों का ध्यान करते हैं, उनके द्वारा जाने-अनजाने में हुए शारीरिक, मानसिक या वाचिक दोष दूर होते हैं और परिवार में आरोग्य एवं सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
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