उत्तराखंड का वो मंदिर, जो साल में सिर्फ रक्षाबंधन पर खुलता है! जानिए क्यों?

चमोली (उत्तराखंड) :उत्तराखंड के चमोली जिले की प्रसिद्ध उर्गम घाटी में स्थित ऐतिहासिक वंशी नारायण मंदिर के कपाट शुक्रवार को रक्षाबंधन के पावन पर्व पर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। साल में महज एक दिन (श्रावण पूर्णिमा/रक्षाबंधन) खुलने वाले इस पावन धाम में भगवान नारायण के दुर्लभ दर्शन पाने के लिए तड़के से ही भारी संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
समुद्रतल से लगभग 12,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं ने उर्गम घाटी से करीब 12 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई पूरी की और भगवान नारायण की चतुर्भुज प्रतिमा के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।
कलगोठ गांव के मक्खन और दूध से लगा महाभोग
वंशी नारायण मंदिर की पूजा परंपरा में स्थानीय 'कलगोठ' गांव की विशेष भूमिका रहती है। परंपरा के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन कलगोठ गांव के ग्रामीण अपने घरों से ताजा दूध और मक्खन लेकर मंदिर पहुंचते हैं। इसी दूध से भगवान नारायण का अभिषेक किया जाता है और मक्खन का महाभोग लगाया जाता है। इसके बाद भगवान का भव्य श्रृंगार कर उन्हें रक्षासूत्र (राखी) अर्पित किया जाता है और फिर श्रद्धालुओं में प्रसाद बांटा जाता है।
364 दिन देवर्षि नारद और केवल एक दिन इंसान करते हैं पूजा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर में वर्ष के 364 दिन स्वयं देवर्षि नारद भगवान नारायण की नित्य पूजा-अर्चना करते हैं। केवल रक्षाबंधन के दिन ही आम इंसानों को यहां पूजा करने और दर्शन का अवसर प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस एक दिन के दर्शन को श्रद्धालु अपने जीवन का अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य मानते हैं। शाम ढलते ही पूजा संपन्न कर मंदिर के कपाट अगले एक साल के लिए पुनः बंद कर दिए जाते हैं।
क्या है पौराणिक महत्व और राजा बलि की कथा?
पौराणिक कथा के अनुसार, वामन अवतार के दौरान भगवान विष्णु राजा बलि की दानशीलता से प्रसन्न होकर उनके द्वारपाल बनकर पाताल लोक चले गए थे। जब लंबे समय तक भगवान बैकुंठ नहीं लौटे, तो माता लक्ष्मी चिंतित हो उठीं। तब देवर्षि नारद ने उन्हें श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को मांग लेने का उपाय बताया।
माता लक्ष्मी ने ऐसा ही किया और राजा बलि ने भगवान विष्णु को पाताल लोक से मुक्त कर दिया। मान्यता है कि पाताल लोक से लौटने के बाद भगवान नारायण सबसे पहले इसी पर्वत शिखर पर प्रकट हुए थे। कत्यूर शैली में निर्मित यह मंदिर उसी पौराणिक घटना और रक्षाबंधन के पावन पर्व का साक्षात प्रतीक माना जाता है।
