पत्थर का कत्ल और हम: क्या सेल्फी ही हमारी आखिरी विरासत है?

सुनीत द्विवेदी
एडिटर
TV10 INDIA
तारीख मुकर्रर है। 18 अप्रैल। 'विश्व धरोहर दिवस'। सरकारी दफ्तरों में फाइलें दौड़ेंगी। कुछ खंडहरों पर झाड़ू लगेगी। और शाम तक हम फिर उसी अंधी दौड़ का हिस्सा हो जाएंगे, जहां 'पुराना' होना अपराध मान लिया गया है। हम उस दौर में जी रहे हैं, जहां हमें ताजमहल के साथ 'सेल्फी' तो चाहिए। लेकिन, घर में रखी दादाजी की पुरानी घड़ी 'कबाड़' लगती है।
हम अजीब लोग हैं। हम अजंता-एलोरा की नक्काशी पर गर्व करते हुए नहीं थकते, लेकिन उसी दीवार पर अपना नाम कुरेदने से बाज नहीं आते। विरासत का मतलब सिर्फ पत्थर, गारा और चूना नहीं होता। विरासत वह सांस है, जो हमारे पुरखों ने इन मीनारों के बीच छोड़ी थी। क्या हम उस सांस को महसूस कर पा रहे हैं? या हमारे लिए धरोहर सिर्फ एक 'पिकनिक स्पॉट' बनकर रह गई है?
जरा उन तथ्यों पर गौर कीजिए, जो हमारी लापरवाही की गवाही दे रहे हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में करीब 3,693 स्मारक हैं। सरकारी रिपोर्ट्स की मानें तो इनमें से दर्जनों स्मारक 'लापता' हो चुके हैं। शहरीकरण की भूख ने उन्हें निगल लिया और हम सोए रहे। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भारत के पास 42 स्थल हैं। हम छठे नंबर पर होने का ढोल तो पीटते हैं, लेकिन क्या रख-रखाव के जुनून में हम पहले नंबर पर खड़े हैं? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के पन्ने पलटिए। हर साल हमारी अनमोल मूर्तियां विदेशों में नीलाम हो रही हैं। ये सिर्फ पत्थरों की चोरी नहीं, हमारे आत्मसम्मान की डकैती है।
शहर कंक्रीट के जंगल बन रहे हैं। ऊंची इमारतों की होड़ में हम उन गलियों को दफन कर रहे हैं। जहां कभी इतिहास करवट लेता था। हमारे पुरखों ने तब 'क्लाइमेट रेजिस्टेंट' इमारतें खड़ी की थीं, जब दुनिया को इंजीनियरिंग का 'ई' भी नहीं पता था। आज की आधुनिक तकनीक उन प्राचीन बावड़ियों और किलों को देखकर मुंह चिढ़ाती है, जो सदियों बाद भी अडिग खड़े हैं।
सच्चाई यह है कि जो कौम अपनी विरासत को सहेज नहीं सकती, वह भविष्य के नक्शे पर कभी अपनी जगह नहीं बना पाती। पत्थर मरते नहीं हैं। उन्हें मार दिया जाता है, हमारी सामूहिक अनदेखी से।
सिर्फ एक दिन 'हेरिटेज वॉक' कर लेने से इतिहास नहीं बचता। 1983 से यह दिन मनाया जा रहा है ताकि हम अपनी 'बर्बादी' को रोक सकें। आंकड़े बताते हैं कि हमारी जीडीपी में पर्यटन का बड़ा हिस्सा है। मतलब, हम उन पत्थरों को बेचकर पैसा तो कमाना चाहते हैं, पर उन्हें सहेजने की जिम्मेदारी से कन्नी काट लेते हैं।
अगर आज हम अपनी कला, अपनी मिट्टी और अपनी वास्तुकला को 'आउटडेटेड' कहकर खारिज कर रहे हैं, तो याद रखिये, कल हम भी किसी के लिए सिर्फ एक धुंधली तस्वीर बनकर रह जाएंगे।
और अंत में सिर्फ इतना ही कहूंगा कि क्या हम वाकई विरासत के हकदार हैं? या हम सिर्फ अपनी जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाने वाले एक आधुनिक 'मूर्ख' समाज के नुमाइंदे भर हैं। जिस दिन आखिरी पुराना पत्थर ढह जाएगा। उस दिन अपनी अगली पीढ़ी को दिखाने के लिए हमारे पास 'स्क्रीन' के अलावा क्या बचेगा? ये बात सोचियेगा जरूर...।
