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मसूरी गोलीकांड के 32 साल: अलग राज्य तो मिला, पर अधूरे हैं शहीदों के सपने; पलायन और बदहाली से आज भी सिसक रहा पहाड़

2 September 2026

AI News Reader

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मसूरी गोलीकांड के 32 साल: अलग राज्य तो मिला, पर अधूरे हैं शहीदों के सपने; पलायन और बदहाली से आज भी सिसक रहा पहाड़

मसूरी: 2 सितंबर 1994 का वह काला दिन आज भी मसूरी और पूरे उत्तराखंड के जेहन में ताजा है, जब अलग राज्य की मांग को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निहत्थे आंदोलनकारियों पर पुलिस और पीएसी की बंदूकों ने कहर बरपाया था। उस खूनी मंजर में छह आंदोलनकारियों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। घटना के तीन दशक से अधिक समय बीतने और 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी आंदोलनकारियों और शहीद परिवारों के जख्म नहीं भरे हैं। बरसी के मौके पर आंदोलनकारियों का एक ही दर्द उभर कर सामने आ रहा है—"राज्य तो मिल गया, लेकिन जिस जल, जंगल, जमीन और पहाड़ के स्वाभिमान के लिए खून बहाया था, वह सपना आज भी अधूरा है।"

प्रमुख बिंदु (Key Highlights):

तारीख और घटना: 2 सितंबर 1994 को मसूरी के झूलाघर के पास पुलिस और पीएसी की गोलीबारी में 6 राज्य आंदोलनकारी शहीद हुए थे।

शहादत: बेलमती चौहान, हंसा धनाई, राय सिंह बंगारी, धनपत सिंह, बलबीर सिंह नेगी और मनमोहन ममगाईं ने दिया था सर्वोच्च बलिदान; पुलिस अधिकारी उमाकांत त्रिपाठी की भी हुई थी मौत।

बर्बरता की दास्तान: गोलीकांड के बाद व्यापक स्तर पर गिरफ्तारियां हुईं और करीब 46 आंदोलनकारियों को बरेली सेंट्रल जेल भेजा गया।

वर्तमान पीड़ा: अलग राज्य बनने के 24 साल बाद भी पहाड़ों से पलायन, बंजर खेत, लचर स्वास्थ्य-शिक्षा व्यवस्था और भ्रष्टाचार से जूझ रहा है उत्तराखंड।

2 सितंबर 1994: जब गोलियों की तड़तड़ाहट से कांप उठी थी 'पहाड़ों की रानी'

राज्य आंदोलनकारी पूरण जुयाल बताते हैं कि 1 सितंबर 1994 को खटीमा में हुए गोलीकांड की खबर से पूरे क्षेत्र में भारी आक्रोश था। अगले दिन यानी 2 सितंबर को मसूरी में आंदोलनकारी एक विशाल जुलूस के रूप में उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति के झूलाघर स्थित कार्यालय की ओर शांतिपूर्ण तरीके से बढ़ रहे थे।

इसी दौरान अचानक गनहिल की ओर से पथराव हुआ और स्थिति तेजी से बिगड़ गई। इसके बाद पुलिस और पीएसी ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस गोलीबारी में दो महिलाओं सहित छह आंदोलनकारियों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया। इस दौरान पुलिस उपाधीक्षक उमाकांत त्रिपाठी की भी मौत हो गई थी। घटना के बाद प्रशासन ने दमनकारी नीति अपनाते हुए लगभग 46 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर बरेली सेंट्रल जेल भेज दिया था।

मसूरी गोलीकांड के अमर बलिदानी:

श्रीमती बेलमती चौहान (प्रसिद्ध महिला आंदोलनकारी)

श्रीमती हंसा धनाई

श्री राय सिंह बंगारी

श्री धनपत सिंह

श्री बलबीर सिंह नेगी

श्री मनमोहन ममगाईं

"पहाड़ आज भी खाली हैं": आंदोलनकारियों का छलका दर्द

1. वादों की आड़ में दफन हुआ पहाड़ का विकास:
राज्य आंदोलनकारी अशोक अग्रवाल का कहना है कि राज्य गठन के समय उम्मीद थी कि पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार मिलेगा, स्कूल और अस्पताल बेहतर होंगे और पलायन थमेगा। लेकिन आज भी पहाड़ के सैकड़ों गांव वीरान (घोस्ट विलेज) हो चुके हैं और उपजाऊ खेत बंजर हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब तक मंत्री और वरिष्ठ नौकरशाह देहरादून छोड़कर पहाड़ों में नहीं बैठेंगे, तब तक धरातल पर वास्तविक विकास संभव नहीं है।

2. शहीद और घायल परिवारों की अनदेखी:
आंदोलनकारी राजेंद्र कंडारी ने अपनी पारिवारिक व्यथा साझा करते हुए बताया कि 2 सितंबर 1994 को उनके भाई को पैर में गोली लगी थी। गोली लगने के बाद वह जीवनभर लाचारी और दर्द में रहे और अंततः 2003 में उनकी मृत्यु हो गई। कंडारी ने बताया कि वे आर्थिक सहायता और न्याय के लिए कई मुख्यमंत्रियों से मिले, लेकिन शासन-प्रशासन ने कभी सुध नहीं ली। सिर्फ बरसी पर फूल चढ़ाने से शहीदों के परिवारों का दर्द कम नहीं होगा।

3. जनभावना से भटकीं सरकारें, बढ़ा भ्रष्टाचार:
पूर्व विधायक और वरिष्ठ आंदोलनकारी जोत सिंह गुनसोला ने कहा कि इस आंदोलन में बच्चे, बूढ़े, महिलाएं और युवा सभी सड़कों पर उतरे थे। लेकिन राज्य बनने के बाद सत्ता पर आम जनता और आंदोलनकारियों का प्रभावी नियंत्रण नहीं रहा, जिससे नौकरशाही हावी हुई और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला। आज विकास के नाम पर पहाड़ों में विनाश जैसी स्थिति खड़ी कर दी गई है।

मसूरी गोलीकांड सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि उत्तराखंड के अस्तित्व और स्वाभिमान का प्रतीक है। आज जब राज्य विकास की नई गाथाएं लिखने का दावा कर रहा है, तब यह सवाल सबसे बड़ा है कि क्या हम उन 6 अमर शहीदों और अनगिनत आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तराखंड बना पाए हैं?