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विश्व योग दिवस: कहीं छूट न जाए आत्मदर्शन का मर्म

21 June 2026

AI News Reader

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विश्व योग दिवस: कहीं छूट न जाए आत्मदर्शन का मर्म

विश्व योग दिवस: कहीं छूट न जाए आत्मदर्शन का मर्म

सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार

संवाद और सरोकारों के इस दौर में जब हम मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि कुछ तारीखें सिर्फ कैलेंडर का पन्ना नहीं बदलतीं, वे हमारे जीने के सलीके को भी एक कसौटी पर कसती हैं। 21 जून की सुबह भी कुछ ऐसी ही दस्तक लेकर आती है। देश-दुनिया के तमाम मैदानों, पार्कों और दफ्तरों के अहातों में बिछी रंग-बिरंगी मैट पर जब लाखों लोग एक साथ सांसों का संधान करेंगे। तब यकीनन वह दृश्य अभिभूत करने वाला होगा।
दिसंबर 2014 का वह मंजर याद कीजिए। जब संयुक्त राष्ट्र संघ में रिकॉर्ड 177 देशों ने भारत के इस प्रस्ताव पर बिना किसी हिचकिचाहट के मुहर लगाई थी। महज 90 दिनों के भीतर मिला यह वैश्विक जनसमर्थन भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति का एक ऐतिहासिक शंखनाद था। लेकिन, आज जब यह विधा करीब 100 अरब डॉलर की एक चमचमाती ग्लोबल वेलनेस इंडस्ट्री में तब्दील हो चुकी है, तब मेरे मन में यह सवाल कौंधता है कि क्या हम इसके मूल तत्व को सहेज पा रहे हैं ? या इसे महज एक भव्य आयोजन के शोर में होम कर रहे हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी विचार को जन-आंदोलन बनाने के लिए उत्सवधर्मिता जरूरी होती है। राजपथ से लेकर न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर तक बनते गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स हमें गौरवान्वित करते हैं। लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है। जब उत्सव केवल 'प्रदर्शन' बनकर रह जाए और 'दर्शन' कहीं पीछे छूट जाए।
आज का संकट शारीरिक कम, मानसिक और नैतिक ज्यादा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े गवाही देते हैं कि वैश्विक स्तर पर हर चौथा व्यक्ति किसी न किसी मानसिक अवसाद या तनाव की गिरफ्त में है। ऐसे दौर में क्या सुबह का एक घंटा योग की मुद्रा में बैठना और बाकी के 23 घंटे उसी ईर्ष्या, राग-द्वेष, और दफ्तरों या समाज की उठापटक में गुजार देना ही योग है? यदि प्राणायाम के बाद भी हमारी सोच में दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और करुणा का संचार नहीं हो रहा, तो हमें ठहरकर सोचना होगा कि कमी कहां रह गई है।

योग का आदि सूत्र कहता है ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’। यानी योग सिर्फ देह को साधने की कला नहीं है, यह मन के भीतर उठने वाले विकारों के बवंडर को शांत करने का उपक्रम है। जब तक चित्त की वृत्तियां शांत नहीं होंगी, तब तक योग केवल एक शारीरिक कसरत से अधिक कुछ नहीं कहलाएगा।
गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण ने जीवन प्रबंधन का एक अद्भुत मंत्र दिया है ‘समत्वं योग उच्यते’। यानी अनुकूलता हो या प्रतिकूलता, सफलता हो या असफलता, हर परिस्थिति में खुद को संतुलित बनाए रखना ही वास्तविक योग है।
आज हमारे समाज को इसी 'समत्व' की सबसे ज्यादा जरूरत है। सोशल मीडिया के इस दौर में जहां हर व्यक्ति अपनी रील्स और तस्वीरों के जरिए खुद को सबसे सुखी और मुकम्मल दिखाने की अंधी होड़ में शामिल है, वहां योग हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का रास्ता दिखाता है। यह हमें सिखाता है कि रीढ़ की हड्डी को सीधा रखने के साथ-साथ अपने नैतिक चरित्र और रीढ़ को भी सीधा और अडिग रखना कितना जरूरी है।
मेरा मानना है कि 21 जून की सुबह को केवल एक रस्म अदायगी या तस्वीरों को साझा करने का जरिया मत बनाइए। इसे एक आत्म-अवलोकन के अवसर में बदलिए। आसनों की पूर्णता से अधिक महत्वपूर्ण विचारों की पवित्रता है।तनावमुक्ति का रास्ता स्टूडियो के महंगे सब्सक्रिप्शन से नहीं, बल्कि संतोष और सादगी से होकर गुजरता है।

"चलते-चलते सिर्फ इतना ही कहूंगा कि जिस दिन हम मैट से उठकर समाज के बीच जाएंगे और किसी मजबूर की तकलीफ को देखकर हमारा मन करुणा से भर उठेगा, उसी दिन हमारे भीतर योग का सही मायनों में प्राकट्य होगा। आइए, इस योग दिवस पर हम केवल प्रदर्शन के भागीदार न बनें, बल्कि आत्मदर्शन के उस मार्ग पर चलने का संकल्प लें, जो भारत को अध्यात्म का विश्वगुरु बनाता है। विचार कीजिएगा।"