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मुनाफे की चुस्कियां, मजदूरों का पसीना और हमारी बेशर्म खामोशी

21 May 2026

AI News Reader

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मुनाफे की चुस्कियां, मजदूरों का पसीना और हमारी बेशर्म खामोशी

चाय दिवस पर विशेष:- 21 मई

चाय की प्याली में उबलता भारत

मुनाफे की चुस्कियां, मजदूरों का पसीना और हमारी बेशर्म खामोशी

सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार

सुबह आंख खुलती नहीं कि उंगलियां मोबाइल से पहले चाय का कप तलाशने लगती हैं। देश की करोड़ों रसोइयों में एक साथ केतली चढ़ती है, भाप उठती है और हम मान लेते हैं कि दिन शुरू हो गया। लेकिन कभी उस भाप के भीतर झांककर देखा है? वहां सिर्फ चाय नहीं उबल रही होती... वहां मजदूर का पसीना, बाजार का लालच और हमारी संवेदनहीनता भी खौल रही होती है।

चाय अब पेय नहीं रही। यह भारत का सबसे स्वीकार्य नशा बन चुकी है। पानी के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा पिया जाने वाला तरल है। और भारत? हम दुनिया के दूसरे सबसे बड़े चाय उत्पादक भी हैं और सबसे बड़े उपभोक्ता भी। यानी जो उगाते हैं, वही सबसे ज्यादा गटकते भी हैं। देश में हर साल करीब 1.35 बिलियन किलोग्राम चाय पैदा होती है और उसका लगभग 80 प्रतिशत हम खुद ही पी जाते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि इस एक प्याली की असली कीमत कौन चुका रहा है? वह आदमी नहीं, जो एयरकंडीशन कैफे में 300 रुपये की ‘ऑर्गेनिक टी’ पीकर इंस्टाग्राम पर स्टोरी डाल रहा है। कीमत चुका रही है असम और दार्जिलिंग के बागानों में झुकी हुई वह औरत, जिसकी उंगलियां सुबह से शाम तक पत्तियां तोड़ते-तोड़ते छिल जाती हैं। जिसकी मजदूरी आज भी कई राज्यों के सम्मानजनक न्यूनतम वेतन तक नहीं पहुंच पाती। हम चाय में इलायची ढूंढते हैं, वहां मजदूर अपनी जिंदगी में रोटी ढूंढ रहा होता है।

विडंबना देखिए। भारत का चाय बाजार 83 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का है। बाजार प्रीमियम हो रहा है। पैकेजिंग चमकदार हो रही है। विज्ञापनों में चाय अब ‘लाइफस्टाइल’ बन चुकी है। लेकिन चाय की शुद्धता? वह लगातार संदिग्ध होती जा रही है। कई सर्वे बताते हैं कि खुले बाजार में बिकने वाली चाय की पत्तियों में कृत्रिम रंग, केमिकल और घटिया मिश्रण पाए जा रहे हैं। यानी हम सुबह-सुबह ताजगी नहीं, मिलावट का घूंट पी रहे हैं और उसे आदत का नाम देकर खुश हैं।

इस देश में लाखों चाय की टपरियां हैं। फुटपाथों से लेकर रेलवे प्लेटफार्म तक, दफ्तरों से लेकर गांव की चौपाल तक। यही भारत की असली ‘स्टार्टअप संस्कृति’ है। एक भगोना, एक स्टोव और उधार में खरीदी गई पत्ती से शुरू होने वाला कारोबार।

आंकड़े कहते हैं कि चाय उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब 3.5 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। लेकिन इनमें से कितनों के पास बीमा है? कितनों की सामाजिक सुरक्षा तय है? कितनों का बुढ़ापा सुरक्षित है? जवाब इतना छोटा है कि शर्म आ जाए।

हम ‘स्टार्टअप इंडिया’ पर तालियां बजाते हैं। लेकिन, पीढ़ियों से सड़क किनारे चाय बेच रहे उस आदमी को कभी उद्यमी नहीं मानते हैं। उसकी दुकान हमारे लिए सिर्फ ‘कटिंग चाय’ का अड्डा है, अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं।

चाय की कहानी भी अजीब है। कहते हैं चीन के सम्राट शेन नुंग ने 2737 ईसा पूर्व में गलती से इसकी खोज की थी। भारत में इसे अंग्रेज लाए थे ताकि साम्राज्य की तिजोरियां भर सकें। अंग्रेज चले गए, मगर आदत छोड़ गए। फर्क सिर्फ इतना है कि तब शोषण पर अंग्रेजी हुकूमत की मुहर थी, आज कॉर्पोरेट पैकेजिंग की चमक है। तब भी मुनाफा ऊपर जाता था, आज भी जाता है। नीचे तब भी मजदूर था, नीचे आज भी वही है।

सच यह है कि हमारी प्याली में सिर्फ चाय नहीं भरी होती। उसमें बाजार का लालच, व्यवस्था की बेरुखी और समाज की चुप्पी भी घुली होती है। तथ्य केवल कागजों पर अच्छे लगते हैं। लेकिन, जब वे प्याली में उतरते हैं तो सवाल पूछते हैं।

इसलिए अगली बार जब चाय की चुस्की लें, तो चीनी थोड़ी कम रखिएगा... और सवाल थोड़े ज्यादा। शायद ज़मीर की नींद खुल जाए।