हम आबादी का जश्न मनाएं या रोएं?

विश्व जनसंख्या दिवस
"सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार"
11 जुलाई। कैलेंडर पर एक तारीख और आ गई। दुनिया इसे 'विश्व जनसंख्या दिवस' कहती है। कुछ लोग इसे आंकड़ों के जाल में लपेटकर आंकड़ेबाजी करेंगे। कुछ सेमिनारों में एयर-कंडीशनर की ठंडी हवा के बीच 'बढ़ती आबादी' पर चिंता के गर्म-गर्म कसीदे कढ़ेंगे। लेकिन सच यह है कि हम एक ऐसे मुहाने पर खड़े हैं, जहां सवाल सिर्फ संख्या का नहीं, उस संख्या के पीछे छिपे 'अस्तित्व' का है।
क्या हमने कभी सोचा है कि जब हम 8 या 9 अरब की आबादी का आंकड़ा छूते हैं, तो वह सिर्फ एक नंबर नहीं होता? वह ज़िम्मेदारियों का, भूख का, रोज़गार का और सबसे बढ़कर संसाधनों पर बढ़ते, उस बेतहाशा दबाव का नाम है, जो इस धरती की छाती को चीर रहा है।
हम अक्सर गर्व से कहते हैं कि हम दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक हैं। हमारे पास 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' यानी युवाओं की फौज है। लेकिन जरा ठहरिए। चश्मा उतारकर जमीन पर देखिए।
क्या यह फौज हुनरमंद है? क्या इनके पास रोजगार है? या यह आबादी सिर्फ एक 'भीड़' बनकर रह गई है। जो ट्रेनों के जनरल डिब्बों से लेकर सोशल मीडिया के कमेंट बॉक्स तक सिर्फ हांफ रही है?
"भीड़ कभी इतिहास नहीं बनाती। इतिहास 'गुणवत्ता' से बनता है, 'मात्रा' से नहीं। अगर आबादी के अनुपात में हमारे पास साक्षरता, स्वास्थ्य और संस्कार नहीं हैं, तो यह आबादी कोई वरदान नहीं, बल्कि एक टाइम बम है, जिस पर हम सब बैठे हैं।"
हवा, पानी, जमीन। प्रकृति ने अपनी तिजोरी में सब कुछ नाप-तोल कर रखा था। लेकिन हमने क्या किया? आबादी बढ़ाई और कुदरत को लूटना शुरू कर दिया। आज शहरों में पीने के पानी के लिए कतारें लगी हैं। सांस लेने के लिए शुद्ध हवा नहीं है। पैर फैलाने के लिए दो गज जमीन मयस्सर नहीं है।
सीधी बात यह है कि आप एक रोटी को 10 टुकड़ों में बांटकर 10 लोगों का पेट नहीं भर सकते। आपको या तो रोटियां बढ़ानी होंगी, या खाने वाले मुंह सीमित करने होंगे। और रोटियां बढ़ाने की भी एक प्राकृतिक सीमा है।
हमें नारों से बाहर निकलना होगा। "छोटा परिवार, सुखी परिवार" की तख्तियां पकड़कर फोटो खिंचाने का दौर चला गया। अब सीधे और कड़े फैसलों का वक्त है। जब तक समाज का आखिरी व्यक्ति यह नहीं समझेगा कि बच्चे का जन्म 'ईश्वर की देन' नहीं, बल्कि 'मानवीय जिम्मेदारी' है, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। बढ़ती आबादी के बीच अमीर और गरीब की खाई को पाटना होगा, वरना असंतोष का ऐसा लावा फूटेगा, जिसे संभालना किसी सरकार के बस में नहीं होगा।
अगर युवा हाथों को काम नहीं मिला, तो यह ऊर्जा विध्वंसक हो जाएगी। विश्व जनसंख्या दिवस सिर्फ एक दिन की रस्म अदायगी नहीं है। यह आईना देखने का दिन है। हमें तय करना होगा कि हम आने वाली पीढ़ी को एक समृद्ध, खुशहाल और हरा-भरा ग्रह देना चाहते हैं, या फिर कंक्रीट के जंगलों में बिलबिलाती एक ऐसी भीड़, जिसके पास जीने के साधन तो छोड़िए, खुलकर सांस लेने की आजादी भी न हो।
सोचिए, क्योंकि अगर आज नहीं सोचा, तो कल सोचने के लिए वक्त भी कम पड़ जाएगा।
