कंक्रीट के मकानों में 'घर' कहीं पीछे छूट गया

15 मई
अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस
कंक्रीट के मकानों में 'घर' कहीं पीछे छूट गया
सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
दीवारों पर लगी 'फैमिली फोटो' अगर मुस्कुरा रही है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं कि ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठा परिवार भी सुखी है।
15 मई को 'अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस' है। विडंबना देखिए, जिस परिवार को हमें जीना था, उसे मनाने के लिए भी अब एक 'तारीख' मुकर्रर करनी पड़ रही है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां हमारे पास फेसबुक पर 5000 'फ्रेंड्स' हैं, लेकिन अपने ही डाइनिंग टेबल पर साथ बैठे पिता से बात करने के लिए 5 मिनट नहीं हैं। परिवार अब संस्था से सिमटकर 'सुविधा' बनता जा रहा है।
हम भारतीय परिवार के गौरवशाली इतिहास की कसमें खाते नहीं थकते, लेकिन आंकड़ों की स्याही कुछ और ही कहानी लिख रही है।
पिछले एक दशक में भारत में 'न्यूक्लियर फैमिली' की संख्या में 15% से अधिक की वृद्धि हुई है। महानगरों में तो 70% से ज्यादा लोग अब संयुक्त परिवारों से कट चुके हैं।
एक सर्वे के अनुसार, भारत के शहरों में रहने वाले हर 4 में से 1 बुजुर्ग अकेलेपन का शिकार है। संयुक्त परिवार की जो छतरी उन्हें सुरक्षा देती थी, वह अब निजी स्वार्थों की धूप में सूख चुकी है।
एक औसत भारतीय परिवार में सदस्य दिन भर में 4 से 6 घंटे स्मार्टफोन पर बिताते हैं। हम एक ही छत के नीचे रहकर भी एक-दूसरे को 'मैसेज' कर रहे हैं, संवाद नहीं।
हालांकि भारत में तलाक की दर वैश्विक स्तर पर कम (करीब 1.1%) है, लेकिन पिछले 10 वर्षों में शहरी क्षेत्रों में तलाक के मामलों में 300% का उछाल आया है। यह दर्शाता है कि आपसी तालमेल और सहिष्णुता का 'सॉफ्टवेयर' क्रैश हो रहा है।
हम डाइनिंग टेबल पर खाना नहीं खाते, अपनी-अपनी स्क्रीन पर 'कंटेंट' खाते हैं। पिता को बेटे के प्रमोशन का पता 'लिंक्डइन' से चलता है। मां को बेटी की उदासी का पता उसके 'व्हाट्सएप स्टेटस' से।
"रिश्तों का ऑक्सीमीटर अब गिर रहा है। हम वाई-फाई की स्पीड पर तो चिल्लाते हैं, लेकिन घर के बड़े-बुजुर्गों की थमी हुई आवाज़ हमें सुनाई नहीं देती।"
बाजारवाद ने हमें यह समझा दिया है कि 'प्राइवेसी' ही सब कुछ है। इसी प्राइवेसी के चक्कर में हमने घर के आंगन छोटे कर दिए और कमरों में ताले बड़े। संयुक्त परिवार में जो 'कलेक्टिव विजडम' थी, उसे हमने गूगल के हवाले कर दिया। जब संकट आता है, तो गूगल सलाह देता है, लेकिन कंधा सिर्फ परिवार ही देता है।
अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस पर केक काटना या स्टेटस डालना बंद कीजिए। अगर वाकई कुछ करना है, तो आज रात अपना मोबाइल 'स्विच ऑफ' करके अपने घर के उस सबसे पुराने सदस्य के पास बैठिए जो आपकी एक मुस्कुराहट की प्रतीक्षा में अपनी यादें भूल रहा है।
याद रखिए, परिवार कोई 'डाटा पैक' नहीं है जिसे खत्म होने पर फिर से रिचार्ज करा लिया जाए। यह वह धरोहर है, जिसके बिना आप दुनिया जीत कर भी अकेले ही खड़े रह जाएंगे।
