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बदरंग होता बचपन और हमारी खामोशी

10 July 2026

AI News Reader

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बदरंग होता बचपन और हमारी खामोशी
"सुनीत द्विवेदी
वरिष्ठ पत्रकार
"

बीते दिनों जब अखबारों के पन्ने पलटते हुए मेलबर्न से आई उस खबर पर नजर ठहरी, तो मन गहरे सोच में डूब गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रेलिया द्वारा किशोरों पर सोशल मीडिया बैन के फैसले को वैश्विक स्तर पर एक बड़ी 'प्रेरणा' बताया है। प्रधानमंत्री का यह बयान सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं है। यह उस गहरी बेचैनी की अभिव्यक्ति है, जिससे आज भारत का हर दूसरा परिवार जूझ रहा है।
अक्सर जब मैं अलग-अलग हिस्सों में जाता हूं, तो माता-पिता मुझसे एक ही दर्द साझा करते हैं, बच्चा हाथ से निकलता जा रहा है। किताब की जगह हाथ में चौबीसों घंटे स्क्रीन रहती है।
आज सवाल सिर्फ ऑस्ट्रेलिया के एक कानून का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत भी अब उस मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है, जहां हमें अपने बच्चों को इस अदृश्य डिजिटल चक्रव्यूह से निकालने के लिए कानूनन कमान संभालनी होगी? हम एक ऐसे समाज में तब्दील होते जा रहे हैं, जहां संवाद तो बढ़ गया है। लेकिन, संपर्क टूट गया है। जरा गौर कीजिए, आज हमारे घरों का परिदृश्य क्या है? 14—15 साल के बच्चे, जिन्हें इस उम्र में मैदानों में पसीना बहाना चाहिए था, वे बंद कमरों में 'लाइक्स' और 'व्यूज' के मरुस्थल में अपनी पहचान ढूंढ रहे हैं। जिसे हम बचपन की मासूमियत कहते थे, उसे आज 'साइबर बुलिंग' और 'एंग्जायटी' ने निगल लिया है। रील्स की 15 सेकेंड की दुनिया ने हमारे बच्चों के धैर्य को खत्म कर दिया है।
ऑस्ट्रेलिया ने हिम्मत दिखाई है। उसने साफ कह दिया कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लेकिन, जब यही बात भारत के संदर्भ में उठती है, तो स्थितियां इतनी सरल नहीं रह जातीं।
चुनौती सिर्फ कानून की नहीं, क्रियान्वयन की है। भारत की सामाजिक और भौगोलिक संरचना दुनिया के किसी भी अन्य देश से जुदा है। यदि सरकार देश में 'टीनेजर्स बैन' जैसा कोई सख्त कदम उठाने का मन बनाती है, तो हमारे सामने व्यावहारिक धरातल पर कई यक्ष प्रश्न खड़े होंगे।
हमारे ग्रामीण और कस्बाई भारत में आज भी एक ही स्मार्टफोन पर पूरा परिवार निर्भर है। ऐसे में 'एज वेरिफिकेशन' का पुख्ता ढांचा हम कैसे तैयार करेंगे? क्या यह सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर नहीं रह जाएगा? हम जानते हैं कि जब भी किसी चीज पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है, तो चोर दरवाजे खुल जाते हैं। वीपीएन और फर्जी आईडी के जरिए बच्चे इस पाबंदी को धता बताने लगेंगे, जो उन्हें कानून तोड़ने की एक नई और खतरनाक प्रवृत्ति की ओर धकेलेगा।

मेरा स्पष्ट मानना है कि सरकार कानून बनाकर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री नहीं कर सकती। निषेध कभी भी किसी समस्या का अंतिम समाधान नहीं होता। अगर आप बच्चों के हाथ से स्क्रीन छीन रहे हैं, तो आपको उन्हें खेलने के लिए मैदान, पढ़ने के लिए लाइब्रेरी और खुलकर सांस लेने के लिए एक स्वस्थ पारिवारिक माहौल देना होगा।
हम डिजिटल युग की अनिवार्यता से मुंह नहीं मोड़ सकते। तकनीक आज की तरक्की का ईंधन है। लेकिन, जब ईंधन ही घर को जलाने लगे, तो अग्निशामक को सक्रिय होना ही पड़ता है।
मेलबर्न में उठी सुगबुगाहट ने दिल्ली के नीति-नियंताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में भी इस दिशा में जल्द ही कुछ कड़े नीतिगत कदम देखने को मिल सकते हैं।

"लेकिन याद रखिए, सरकारें केवल नियम बदल सकती हैं, संस्कार नहीं। सोशल मीडिया के इस आत्मघाती मोहपाश से बच्चों को बचाने की पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी परिवार की है। कानून अपनी जगह काम करेगा। लेकिन, हमें अपने घरों में संवाद की उस खोई हुई संस्कृति को वापस लाना होगा, जहां बच्चों को स्क्रीन से ज्यादा मां की लोरी और पिता की झिड़की में अपनापन महसूस हो। वक़्त तेजी से हाथ से फिसल रहा है, यदि आज हम नहीं चेते, तो आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी।"